द लोकतंत्र/ पटना : बिहार चुनाव 2025: सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) ने इस बार बड़ा राजनीतिक दांव खेला है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी यह पार्टी अब बिहार में उसी एनडीए के खिलाफ मैदान में उतर आई है। सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने बिहार की 47 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है, जिससे राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है।
ओपी राजभर की पार्टी का यूपी में बीजेपी के साथ गठबंधन है
ओपी राजभर की पार्टी का यूपी में बीजेपी के साथ गठबंधन है और वह एनडीए का हिस्सा भी है, लेकिन बिहार में उन्होंने बीजेपी और जदयू दोनों को नज़रअंदाज़ करते हुए अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी। इस कदम को एनडीए की एकता में दरार के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सुभासपा का यह कदम बिहार में बीजेपी के लिए बैकफुट का कारण बन सकता है, खासकर उन इलाकों में जहां ओबीसी और राजभर समुदाय का प्रभाव है।
सुभासपा ने बिहार की 47 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा की है। इनमें पार्टी के बिहार अध्यक्ष उदय नारायण राजभर को औरंगाबाद की ओबरा सीट से टिकट दिया गया है। मुख्य उम्मीदवारों में गोह से गुड्डू राजवंशी, नवीनगर से धर्मेंद्र रजवार, कुर्था से रीना देवी पासवान, कसवां से कुंदन कुमार मंडल, पूर्णिया से मीना देवी राजवंशी, कढ़वा से प्रदीप कुमार सुमन, तरारी से राजू राजवंशी, ब्रह्मपुर से सुनील कुमार राजभर, भभुआ से अमरजीत सिंह, डुमरांव से अखिलेश सिंह यादव, सासाराम से रेखा देवी, अरवल से पंचम कुमार रजवार, रजौली से चंदन कुमार राजवंशी और वाल्मिकीनगर से विंदवासिनी राजभर शामिल हैं। कुल सूची में राजभर, पासवान, राजवंशी और रजक समुदाय को विशेष तरजीह दी गई है।
एनडीए में सीट शेयरिंग के दौरान सुभासपा को एक भी सीट नहीं मिली
एनडीए में सीट शेयरिंग के दौरान सुभासपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। इसी के बाद से ओपी राजभर और उनके बेटे अरविंद राजभर खुलकर नाराज दिखाई दिए। ओपी राजभर ने बयान दिया था कि जब उपचुनाव में मदद की जरूरत थी तब बिहार बीजेपी अध्यक्ष खुद गुहार लगा रहे थे, लेकिन अब विधानसभा चुनाव में उन्हें पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया। यही कारण है कि पार्टी अब अपना राजनीतिक वजूद खुद साबित करने के मूड में है।
सुभासपा का यह फैसला बीजेपी और जदयू के लिए चुनावी चुनौती बन सकता है। राजभर समुदाय की जनसंख्या बिहार के सीमावर्ती जिलों जैसे सासाराम, भभुआ, बक्सर, गोपालगंज, वाल्मिकीनगर और सीवान में काफी प्रभावशाली है। ऐसे में अगर सुभासपा इन इलाकों में अपने जातीय आधार पर वोट हासिल करती है तो इसका सीधा असर बीजेपी के वोट बैंक पर पड़ेगा।
सुभासपा की एंट्री से ओबीसी वोट में सेंध
बिहार चुनाव में जातीय समीकरण हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। सुभासपा की एंट्री से ओबीसी वोट तीन हिस्सों में बंट सकते हैं। एनडीए, महागठबंधन और छोटे क्षेत्रीय दलों में। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुभासपा को 2-3% वोट शेयर भी मिलता है तो यह कई सीटों पर एनडीए को नुकसान पहुंचा सकता है।
ओपी राजभर पहले भी अपने बयानों और अप्रत्याशित फैसलों से सुर्खियों में रहे हैं। अब बिहार में उतरकर वे यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी पार्टी सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं है। यह कदम उन्हें पूर्वी भारत में एक प्रभावशाली ओबीसी नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश भी माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सुभासपा प्रमुख ओपी राजभर का यह फैसला एनडीए के लिए नई मुश्किलें लेकर आया है। जहां बीजेपी को अपने पुराने सहयोगी की नाराजगी झेलनी पड़ रही है, वहीं सुभासपा इस चुनाव में अपनी राजनीतिक ताकत साबित करने की पूरी कोशिश कर रही है।

