द लोकतंत्र : ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल संयम नहीं, बल्कि “ब्रह्म के मार्ग पर चलना” है। यह जीवन का वह पथ है, जिस पर चलकर व्यक्ति अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाता है।
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, विद्यार्थी जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यही सफलता, एकाग्रता और आत्मशक्ति का मूल आधार है।
ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ
ब्रह्मचर्य का मतलब सिर्फ यौन संयम नहीं होता, बल्कि यह मन, वचन, दृष्टि और कर्म में संयम और अनुशासन रखने की प्रक्रिया है।
जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह अपनी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को व्यर्थ नहीं गंवाता, बल्कि उसे ज्ञान, साधना और लक्ष्य की प्राप्ति में लगाता है।
विद्यार्थी जीवन में ब्रह्मचर्य का महत्व
विद्यार्थी का जीवन सीखने, साधना और आत्म-विकास का समय होता है।
इस उम्र में मन का नियंत्रण और इंद्रियों पर संयम बेहद आवश्यक है क्योंकि यही वह अवस्था है जहाँ मन भटकने लगता है।
ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला विद्यार्थी एकाग्र मन, तेज बुद्धि और मजबूत इच्छाशक्ति का मालिक बनता है।
प्रेमानंद महाराज के बताए उपाय
प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि यदि विद्यार्थी जीवन में ब्रह्मचर्य का पालन नहीं हो पा रहा है, तो इसके लिए नियम, संगति और साधना को अपनाना जरूरी है।
उनके अनुसार—
मन को भगवान के नाम में लगाएं और नियमित रूप से नाम-जप करें।
संतों के चरित्र और सत्संग का श्रवण करें, इससे मन में पवित्रता आती है।
बुरी संगति से बचें, क्योंकि संगति ही मनुष्य के स्वभाव को आकार देती है।
दिनचर्या में अनुशासन लाएं, समय पर उठना, पढ़ना और सोना आवश्यक है।
अश्लीलता और व्यर्थ की चीजों से दूरी बनाएं। मोबाइल और इंटरनेट का संयमित प्रयोग करें।
योग और प्राणायाम को दिनचर्या में शामिल करें, इससे ऊर्जा नियंत्रित रहती है।
पवित्र भोजन करें और नकारात्मक विचारों से बचें।
महाराज जी कहते हैं, “मन को जब विषय-विकारों से हटाकर भगवान में लगाया जाता है, तभी सच्चा ब्रह्मचर्य संभव होता है।”
ब्रह्मचर्य केवल धर्म या परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवनशैली और आत्मनियंत्रण की कला है। विद्यार्थी अगर इसका पालन करें तो न केवल परीक्षा में सफलता पाएंगे, बल्कि जीवन में भी स्थिरता और मानसिक शांति प्राप्त करेंगे।

