द लोकतंत्र : उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर हर वर्ष लगने वाला माघ मेला भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मेलों में एक विशिष्ट स्थान रखता है। पूरे एक माह तक चलने वाला यह महापर्व करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, तप, साधना, संयम और जागरण का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस देवभूमि और पुण्यस्थल में माघ महीने के दौरान डुबकी लगाने से पापों का नाश होता है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पुराणों में संगम क्षेत्र को अत्यंत पवित्र बताया गया है। अक्षयवट, सरस्वती कूप और त्रिवेणी क्षेत्र प्राचीन काल से ही ऋषियों और साधकों की तपस्थली रहे हैं। इतिहासकारों का मत है कि यह मेला कई हजार वर्षों से निरंतर आयोजित होता आ रहा है और समय के साथ इसकी भव्यता में लगातार वृद्धि हुई है। लाखों श्रद्धालु, जिन्हें कल्पवासी कहा जाता है, पूरे एक माह तक यहाँ निवास कर कठिन नियमों का पालन करते हुए माघ कल्पवास करते हैं।
माघ मेला 2026 का कैलेंडर
पंचांग के मुताबिक, वर्ष 2026 का माघ मेला पौष पूर्णिमा के दिन से शुरू होकर महाशिवरात्रि तक चलेगा। इस अवधि के दौरान, कुल 6 प्रमुख पवित्र स्नान आयोजित किए जाएंगे, जिनमें मौनी अमावस्या का स्नान सबसे प्रमुख माना जाता है।
प्रमुख स्नान तिथि (2026) धार्मिक महत्व पौष पूर्णिमा 3 जनवरी, शनिवार माघ मेला और कल्पवास का शुभारंभ। आध्यात्मिक तप की शुरुआत। मकर संक्रांति 14 जनवरी, बुधवार सूर्य का धनु से मकर राशि में प्रवेश। अत्यंत पुण्यदायी दूसरा शाही स्नान। मौनी अमावस्या 18 जनवरी, रविवार माघ मेला का सबसे बड़ा पर्व। मौन साधना, दान और संगम स्नान विशेष फलदायी। वसंत पंचमी 23 जनवरी, शुक्रवार बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक। चौथा प्रमुख स्नान और सरस्वती पूजा का दिन। माघी पूर्णिमा 1 फरवरी, रविवार कल्पवासियों के लिए विशेष महत्व। संगम स्नान और दान के साथ कल्पवास की समाप्ति। महाशिवरात्रि 15 फ़रवरी, रविवार माघ मेला का अंतिम स्नान। भगवान शिव की पूजा और उपवास के साथ समापन।
मौनी अमावस्या का विशेष फल
ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार, मौनी अमावस्या (18 जनवरी 2026) का स्नान सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन मौन व्रत धारण कर संगम में डुबकी लगाने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। यह दिन दान-पुण्य, पितरों के तर्पण और मनोकामना सिद्धि के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। कल्पवासी, जो एक माह तक संयम और साधना में लीन रहते हैं, उनके लिए माघी पूर्णिमा (1 फरवरी) का स्नान कल्पवास की पूर्णता का प्रतीक है।
वर्ष 2026 का माघ मेला एक बार फिर देश और विदेश के करोड़ों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करेगा। यह पर्व केवल स्नान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में निहित त्याग, तपस्या और सात्विकता के सिद्धांतों का एक जीवंत प्रदर्शन है। यह सुनिश्चित करता है कि प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा, जो मोक्ष की कामना से जुड़ी है, निरंतर बनी रहे।

