द लोकतंत्र : भारतीय काल गणना की वैज्ञानिक पद्धति एक बार फिर एक दुर्लभ खगोलीय घटनाक्रम की साक्षी बनने जा रही है। आगामी 19 मार्च 2026 से प्रारंभ होने वाला हिंदू नववर्ष ‘विक्रम संवत 2083’ सामान्य वर्षों की भांति 12 महीनों का न होकर पूरे 13 महीनों का होगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ माह में ‘अधिकमास’ (मलमास) का संयोग बन रहा है, जिससे ज्येष्ठ का महीना लगभग 60 दिनों का होगा। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, यह घटना पंचांगीय शुद्धि और खगोलीय संतुलन का परिणाम है, जिसे आध्यात्मिक दृष्टि से ‘पुरुषोत्तम मास’ के रूप में पूजा जाता है।
खगोलीय आधार: सौर और चंद्र वर्ष का गणितीय संतुलन
हिंदू पंचांग सूर्य और चंद्रमा दोनों की गतियों पर आधारित है। इन दोनों के बीच समय के अंतर को पाटने के लिए अधिकमास की व्यवस्था की गई है।
- गणितीय अंतर: सौर वर्ष में 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट और 46 सेकंड होते हैं, जबकि चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है। प्रति वर्ष आने वाला यह 11 दिनों का अंतर 32 महीने और 16 दिनों में बढ़कर लगभग एक पूर्ण महीने (30 दिन) के बराबर हो जाता है।
- पंचांगीय समायोजन: यदि यह अतिरिक्त महीना न जोड़ा जाए, तो चंद्र कैलेंडर पर आधारित त्योहार धीरे-धीरे अपने वास्तविक मौसम से दूर हो जाएंगे। उदाहरण के लिए, दिवाली ग्रीष्म ऋतु में और होली कड़ाके की ठंड में आने लगेगी। अधिकमास इसी विसंगति को दूर कर ऋतुओं और तिथियों में सामंजस्य स्थापित करता है।
पुरुषोत्तम मास: पौराणिक महत्व और आध्यात्मिक वरदान
शास्त्रों के अनुसार, जब इस अतिरिक्त महीने को किसी देवता का स्वामित्व प्राप्त नहीं हुआ, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ प्रदान किया।
- दुर्लभ घटनाक्रम: 17 मई 2026 से 15 जून 2026 तक अधिक ज्येष्ठ मास रहेगा। इसके उपरांत 22 मई से 29 जून तक सामान्य ज्येष्ठ मास चलेगा। यह ओवरलैपिंग पंचांग की एक जटिल किंतु सटीक गणना है।
- मांगलिक कार्यों पर विराम: मलमास की अवधि में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और यज्ञोपवीत जैसे संस्कार वर्जित माने गए हैं। इसका उद्देश्य सांसारिक कार्यों को विराम देकर आध्यात्मिक ऊर्जा के संचय को प्राथमिकता देना है।
- आध्यात्मिक शुद्धि: मान्यता है कि इस मास में किया गया दान, जप और तप अन्य महीनों की तुलना में दस गुना अधिक फलदायी होता है। यह स्वयं के अंतर्मन की सफाई और ईश्वरीय सत्ता से जुड़ने का महापर्व है।
त्योहारों की तिथियों में बदलाव
- अधिकमास के आगमन से विक्रम संवत 2083 के आगामी सभी व्रत और त्योहार निर्धारित समय से 15 से 20 दिन की देरी से आएंगे। ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, सावन, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि और दीपावली जैसी महत्वपूर्ण तिथियां इस बार आगे खिसक जाएंगी। यह खगोलीय घटनाक्रम न केवल ज्योतिषियों के लिए शोध का विषय है, बल्कि सामान्य जनमानस के लिए भी संयम और साधना का संदेश लेकर आता है।
निष्कर्षतः, विक्रम संवत 2083 का यह 13वां महीना हमारी प्राचीन वैदिक परंपरा की गणितीय श्रेष्ठता का प्रमाण है। जहाँ पश्चिमी कैलेंडर केवल सूर्य की गति पर टिके हैं, वहीं हमारा पंचांग ब्रह्मांड के दो प्रमुख प्रकाश पुंजों—सूर्य और चंद्रमा—के बीच संतुलन स्थापित करता है। ‘पुरुषोत्तम मास’ के रूप में यह अवधि हमें भौतिक भागदौड़ से हटकर आध्यात्मिक उत्थान का अवसर प्रदान करती है।

