द लोकतंत्र : उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित नैमिषारण्य को हिंदू धर्म में एक अत्यंत महान और चमत्कारिक तीर्थ स्थल का दर्जा प्राप्त है। यह स्थान वर्तमान में चल रहे कलयुग के व्यापक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तपोभूमि के दर्शन के बिना किसी भी श्रद्धालु की चार धाम यात्रा अधूरी मानी जाती है, जो इसके अध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करता है। यह स्थल नैमिष या नीमषार के नाम से भी प्रख्यात है और लखनऊ से करीब 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
वेद-पुराणों में नैमिषारण्य का उल्लेख
नैमिषारण्य का वर्णन वेद-पुराण समेत तमाम धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से देखने को मिलता है।
- महापुराणों की रचना: यह वही स्थान है जहां महर्षि व्यास के शिष्य सूतजी ने 88 हजार ऋषि-मुनियों को महापुराणों की कथा सुनाई थी और पुराणों की रचना की गई थी।
- तपस्या की भूमि: प्राचीन काल में इसी जगह पर 88 हजार ऋषि-मुनियों ने कठिन तपस्या की थी, जिसके कारण इसे ‘तपोभूमि’ के नाम से भी जाना जाता है। महाभारत काल में पांडु पुत्र अर्जुन और युधिष्ठिर भी इस स्थान पर आए थे।
प्रमुख आकर्षण और 84 कोस परिक्रमा
मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने स्वयं इस स्थान को ध्यान योग के लिए सबसे उत्तम बताया था। नैमिषारण्य कई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों का केंद्र है।
- मुख्य स्थल: यहां चक्रतीर्थी (जहाँ ब्रह्मा जी का चक्र गिरा था), व्यास गद्दी, भूतेश्वनाथ मंदिर, शक्तिपीठ ललिता देवी का मंदिर, शेष मंदिर, हनुमान गढ़ी और रुद्रावर्त जैसे अनेक स्थान मौजूद हैं।
- 84 कोस परिक्रमा: नैमिषारण्य आने वाले श्रद्धालु इसकी परिक्रमा करते हैं। यह परिक्रमा 84 कोस की है और इसका आयोजन हर वर्ष फाल्गुनमास की अमावस्या के बाद प्रतिपदा की तिथि से लेकर पूर्णिमा तक किया जाता है।
- अक्षय वट का पेड़: यहां पर ‘पंचप्रयाग’ नामक एक पक्का सरोवर भी है, जिसके किनारे पर 5099 साल पुराना अक्षय वट का पेड़ स्थित है, जो इस स्थान की प्राचीनता का प्रतीक है।
नैमिषारण्य सिर्फ एक तीर्थ स्थल नहीं है, बल्कि यह भारतीय अध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत केंद्र है, जो आज भी लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।

