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Property Guide: नोएडा में लीजहोल्ड संपत्ति के पेचीदा नियम; क्या अथॉरिटी बीच में बढ़ा सकती है रेंट? जानें अपने Legal Rights

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द लोकतंत्र : दिल्ली-एनसीआर, विशेषकर नोएडा और ग्रेटर नोएडा जैसे नियोजित शहरों में संपत्ति खरीदना अन्य शहरों की तुलना में भिन्न है। यहाँ अथॉरिटी जमीन को ‘फ्रीहोल्ड’ के बजाय ‘लीज़होल्ड’ पर अलॉट करती है। हाल के दिनों में खरीदारों के बीच यह चिंता बढ़ी है कि क्या अथॉरिटी अलॉटमेंट के बाद मनमाने ढंग से चार्जेस बढ़ा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, लीज़होल्ड प्रॉपर्टी का भविष्य और वित्तीय दायित्व पूरी तरह से साइन की गई ‘लीज़ डीड’ और भुगतान के विकल्प पर निर्भर करता है।

लीज़ अवधि और हस्तांतरण: 90 वर्षों का अनुबंध

नोएडा अथॉरिटी आमतौर पर जमीन 90 या 99 वर्षों के लिए लीज़ पर देती है। इस अवधि के बाद तकनीकी रूप से प्रॉपर्टी वापस सरकार के पास चली जाती है, जब तक कि उसे निश्चित शुल्क देकर फ्रीहोल्ड में परिवर्तित न करा लिया जाए।

  • OTLR का विकल्प: नोएडा में दो विकल्प मिलते हैं—सालाना किराया या वन टाइम लीज़ रेंट (OTLR)। यदि खरीदार शुरुआत में ही एकमुश्त OTLR का भुगतान कर देता है, तो उसे भविष्य में सालाना किराया देने की आवश्यकता नहीं होती।
  • कानूनी परिभाषा: ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट के तहत, लीज़ का तात्पर्य किसी अवधि के लिए संपत्ति इस्तेमाल करने का अधिकार देना है। इसके लिए भुगतान एक बार में भी किया जा सकता है, जो इसे पूरी तरह वैध बनाता है।

क्या अथॉरिटी बढ़ा सकती है किराया? न्यायिक दृष्टिकोण

खरीदारों के मन में सबसे बड़ा सवाल अथॉरिटी की शक्तियों को लेकर होता है।

  • डीड की शर्तें: खैतान एंड कंपनी के विशेषज्ञों के अनुसार, अथॉरिटी तभी किराया बढ़ा सकती है जब लीज़ डीड में इसका स्पष्ट प्रावधान हो। यदि एकमुश्त प्रीमियम तय हो चुका है, तो अथॉरिटी बाद में नया सालाना किराया नहीं थोप सकती।
  • राजस्थान का मिसाल: राजस्थान में प्लॉट होल्डर्स के पक्ष में आया फैसला एक नजीर है। वहां सरकार ने अलॉटमेंट के 3 साल बाद मार्केट वैल्यू का 5% सालाना रेंट मांगा था, जिसे अदालत ने गलत ठहराया।

भविष्य का प्रभाव: फ्रीहोल्ड की बढ़ती मांग

नोएडा और ग्रेटर नोएडा में संपत्ति को फ्रीहोल्ड में बदलने की मांग लगातार उठ रही है। फ्रीहोल्ड होने पर मालिकाना हक स्थायी हो जाता है और बैंक लोन व संपत्ति के पुनर्विक्रय (Resale) में आसानी होती है। आने वाले वर्षों में नीतिगत बदलावों की संभावना है, जिससे आम खरीदार को राहत मिल सके।

निष्कर्षतः, नोएडा जैसे शहर में निवेश करते समय लीज़ डीड के एक-एक शब्द को पढ़ना अनिवार्य है। एकमुश्त लीज़ रेंट का विकल्प चुनना भविष्य की प्रशासनिक पेचीदगियों से बचने का सबसे सुरक्षित तरीका है।

Team The Loktantra

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