Advertisement Carousel
Spiritual

महादेव के माथे पर क्यों सजता है चंद्रमा? कालकूट विष की तपिश से जुड़ी है ये रोचक कहानी

The loktnatra

द लोकतंत्र : भगवान शिव हिंदू धर्म के सबसे शक्तिशाली और रहस्यमयी देवता माने जाते हैं। उनके गले में लिपटा सांप, जटाओं से बहती गंगा और शरीर पर रमी भस्म—शिव का हर रूप एक गहरा संदेश देता है। अक्सर हमारे मन में यह सवाल उठता है कि आखिर भोलेनाथ ने अपने माथे पर चंद्रमा को क्यों धारण किया है? इसके पीछे न केवल एक महान पौराणिक कथा है, बल्कि जीवन का एक बड़ा सबक भी छिपा है।

जब सृष्टि पर मंडराया ‘कालकूट’ विष का खतरा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय जब देवताओं और असुरों के बीच ‘समुद्र मंथन’ हुआ था, तब उसमें से 14 रत्न निकले थे। लेकिन रत्नों से पहले निकला था ‘कालकूट’ (हलाहल) नाम का भयंकर विष। यह विष इतना जहरीला था कि इसकी महक मात्र से ही पूरी सृष्टि खत्म होने की कगार पर पहुँच गई थी। देवता और दानव, सभी इसे देखकर कांपने लगे।

महादेव बने ‘नीलकंठ’

जब कोई भी उस विष को संभालने के लिए तैयार नहीं हुआ, तब भगवान शिव आगे आए। उन्होंने पूरी सृष्टि को बचाने के लिए उस विष को पी लिया। माता पार्वती ने विष को उनके शरीर में जाने से रोकने के लिए शिव जी का गला पकड़ लिया, जिससे वह जहर उनके कंठ (गले) में ही रुक गया। जहर की वजह से उनका गला नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।

चंद्रदेव ने शिव जी को दी ठंडक

जहर तो गले में रुक गया, लेकिन उस विष की गर्मी इतनी ज्यादा थी कि महादेव का शरीर तपने लगा। उनका पूरा अस्तित्व आग की तरह जलने लगा। भगवान शिव की इस जलन और गर्मी को कम करने के लिए चंद्रदेव ने उनसे प्रार्थना की। चूंकि चंद्रमा को शीतलता (ठंडक) और शांति का प्रतीक माना जाता है, इसलिए उन्होंने महादेव के शरीर को ठंडक देने का प्रस्ताव रखा।

शिव जी ने चंद्रदेव की प्रार्थना स्वीकार की और उन्हें अपने मस्तक (माथे) पर स्थान दिया। चंद्रमा की शीतल किरणों ने विष के प्रभाव से तप रहे शिव जी के शरीर को शांत किया। यही कारण है कि शिव जी को हमेशा चंद्रमा के साथ देखा जाता है।

संतुलन का प्रतीक है यह रूप

आध्यात्मिक नजरिए से देखा जाए तो शिव जी का यह रूप ऊर्जा के संतुलन को दिखाता है। शिव के भीतर तांडव वाली उग्रता भी है और चंद्रमा जैसी अपार शांति भी। उनके माथे पर लगा चाँद हमें यह सिखाता है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विकट (विष के समान) क्यों न हों, हमें अपने मन (चंद्रमा) को हमेशा शांत और संतुलित रखना चाहिए।

साथ ही, शिव के मस्तक का चंद्रमा यह भी बताता है कि वे ‘महाकाल’ हैं, जो समय के चक्र और जन्म-मृत्यु से ऊपर हैं।

Uma Pathak

Uma Pathak

About Author

उमा पाठक ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में स्नातक और बीएचयू से हिन्दी पत्रकारिता में परास्नातक किया है। पाँच वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाली उमा ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएँ दी हैं। उमा पत्रकारिता में गहराई और निष्पक्षता के लिए जानी जाती हैं।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like

साधना के चार महीने
Spiritual

Chaturmas 2025: चार महीने की साधना, संयम और सात्विक जीवन का शुभ आरंभ

द लोकतंत्र: चातुर्मास 2025 की शुरुआत 6 जुलाई से हो चुकी है, और यह 1 नवंबर 2025 तक चलेगा। यह चार
SUN SET
Spiritual

संध्याकाल में न करें इन चीजों का लेन-देन, वरना लौट सकती हैं मां लक्ष्मी

द लोकतंत्र : हिंदू धर्म में संध्याकाल यानी शाम का समय देवी लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। यह वक्त