द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : भारत-कनाडा स्ट्रैटेजिक एनर्जी पार्टनरशिप (India-Canada Strategic Energy Partnership) के तहत 2.6 अरब डॉलर का यूरेनियम सप्लाई समझौता और SMR सहयोग तय। जयराम रमेश ने 2008 की इंडो-यूएस सिविल न्यूक्लियर डील को इस करार की बुनियाद बताया।
भारत और कनाडा के बीच नई Strategic Energy Partnership पर सियासी बयानबाज़ी तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद Jairam Ramesh ने सोमवार को कहा कि आज साइन हुआ ऊर्जा समझौता दरअसल 2008 की ऐतिहासिक Indo-US Civil Nuclear Agreement की देन है। उनके मुताबिक, उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री Manmohan Singh के ‘दृढ़ आग्रह और राजनीतिक साहस’ के कारण भारत को न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) से छूट मिली, जिसने दशकों पुरानी ‘न्यूक्लियर आइसोलेशन’ की स्थिति को समाप्त किया।
रमेश ने यह भी याद दिलाया कि 2008 के बाद जब अमेरिका और NSG ने भारत को छूट दी, तब 2010 में कनाडा ने भारत के साथ न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट (NCA) साइन किया। उनका दावा है कि मौजूदा कार्नी-मोदी प्रशासन के दौर में वही सहयोग अब अपने “पूर्ण आर्थिक स्वरूप” तक पहुंचा है। नए समझौते के तहत कनाडाई कंपनी Cameco अगले दस वर्षों में भारत को करीब 2.2 करोड़ पाउंड यूरेनियम कंसन्ट्रेट की आपूर्ति करेगी। लगभग 2.6 अरब डॉलर का यह दीर्घकालिक अनुबंध भारत के प्रेसराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR) बेड़े के लिए ईंधन सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
SMR सहयोग और ‘नेट ज़ीरो’ लक्ष्य की ओर कदम
भारत-कनाडा साझेदारी अब पारंपरिक बड़े रिएक्टर मॉडल से आगे बढ़कर Small Modular Reactors (SMRs) जैसी अगली पीढ़ी की तकनीक पर केंद्रित हो रही है। कनाडा के प्रधानमंत्री Mark Carney ने प्रधानमंत्री Narendra Modi के साथ संयुक्त बयान में कहा कि यह साझेदारी दोनों देशों के लिए ‘पीढ़ीगत अवसर’ लेकर आई है।
SMR तकनीक अपेक्षाकृत सुरक्षित, कम लागत वाली और दूरदराज़ इलाकों में तैनात करने में आसान मानी जाती है। भारत के 2040 तक ऊर्जा मांग दोगुनी होने के अनुमान और 500 गीगावाट नवीकरणीय क्षमता जोड़ने के लक्ष्य के मद्देनज़र यह सहयोग ‘नेट ज़ीरो’ रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इतिहास से वर्तमान तक: पोखरण से पुनर्स्थापित रिश्तों तक
भारत-कनाडा परमाणु सहयोग का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री Indira Gandhi के दौर में कनाडा ने भारत को CANDU (Canada Deuterium Uranium) रिएक्टर तकनीक में सहयोग दिया था। लेकिन 18 मई 1974 को राजस्थान के Pokhran Test Range में हुए ‘Peaceful Nuclear Explosion’ के बाद कनाडा ने सहयोग रोक दिया था।
करीब तीन दशक बाद 2008 की न्यूक्लियर डील ने इस जमे हुए रिश्ते को नई दिशा दी। अब यूरेनियम सप्लाई और SMR सहयोग के जरिए दोनों देश पारंपरिक ऊर्जा ब्लॉकों से परे जाकर दीर्घकालिक रणनीतिक तालमेल की ओर बढ़ रहे हैं। वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में अस्थिरता और स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती मांग के बीच यह समझौता भारत-कनाडा संबंधों को आर्थिक आधार देने वाला अहम कदम माना जा रहा है।

