द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत मिलने के बाद कांग्रेस पार्टी ने इस फैसले का स्वागत किया है और इसे न्यायपालिका की निष्पक्षता का प्रतीक बताया है। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी को लेकर दिए गए बयान से जुड़ा था, जिस पर खेड़ा के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित प्रतीत होता है, जिसके आधार पर खेड़ा को राहत दी गई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया दी।
कांग्रेस का कहना है कि यह फैसला इस बात का प्रमाण है कि कानून सभी के लिए समान है और कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो। पार्टी ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत बताया है।
अभिषेक मनु सिंघवी का बयान: न्यायपालिका अंतिम उम्मीद
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में होती है, तब अदालतें ही नागरिकों के लिए अंतिम सहारा होती हैं। उन्होंने इस फैसले को न्यायपालिका की मजबूती का उदाहरण बताते हुए कहा कि अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि गिरफ्तारी किसी भी मामले में पहला कदम नहीं होना चाहिए।
सिंघवी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से अपील की कि वे इस पूरे मामले पर पुनर्विचार करें और अपने रुख में बदलाव लाएं। उन्होंने कहा कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को भाषा और व्यवहार में संयम रखना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐसे पद पर रहते हुए इस तरह की तीखी प्रतिक्रिया उचित है।
राजनीतिक उद्देश्य से की गई कार्रवाई: कांग्रेस का आरोप
अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोप लगाया कि इस मामले का उद्देश्य पवन खेड़ा को चुनाव के दौरान परेशान करना और उनकी छवि को नुकसान पहुंचाना था। उन्होंने कहा कि जब मानहानि या प्रतिष्ठा से जुड़े मामले सामने आते हैं, तो गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि पहला। कांग्रेस का दावा है कि इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक दबाव और प्रतिद्वंद्विता की भूमिका साफ नजर आती है।
सिंघवी ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में असम के मुख्यमंत्री के बयान का विस्तार से उल्लेख किया है, लेकिन कई ऐसी बातें हैं जिन्हें सार्वजनिक रूप से दोहराना भी संभव नहीं है। उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वे इस मामले पर गंभीरता से विचार करें और यदि आवश्यक हो तो खेद व्यक्त करें। उनके अनुसार, ऐसा करने से मुख्यमंत्री की राजनीतिक गरिमा और बढ़ेगी। इस फैसले ने एक बार फिर राजनीतिक बयानबाजी, कानून के दायरे और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर नई बहस को जन्म दिया है।

