द लोकतंत्र/ Deoria : कहते हैं कि मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार और अस्थि विसर्जन केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और सम्मान से विदाई का प्रतीक होता है। लेकिन समाज में ऐसे भी लोग होते हैं जिनका जीवन तो अकेलेपन में बीतता ही है, मृत्यु के बाद भी उन्हें अपना कहने वाला कोई नहीं होता। ऐसे ही लावारिस और निराश्रित मृतकों की आत्मा की शांति के लिए एक अनूठी और मानवीय पहल सामने आई है।
उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से 350 से अधिक लावारिस मृतकों की अस्थियों को हरिद्वार लाकर पवित्र गंगा नदी में विधि-विधान के साथ विसर्जित किया गया। यह कार्य श्री कृष्ण कृपा कामधेनु अनाथ गौ-नंदीशाला, हरिद्वार के संरक्षक सदस्य संजय पाठक और संस्था के अध्यक्ष अनिकेत गिरि के नेतृत्व में संपन्न हुआ। हरिद्वार के गंगा तट पर तीर्थ पुरोहित पंडित रमाकांत शर्मा की देखरेख में वैदिक मंत्रोच्चार और पूजा-अर्चना के साथ अस्थियों का विसर्जन किया गया।
Deoria में दो वर्षों तक संजोया संकल्प, अब मिली आत्माओं को अंतिम विदाई
संजय पाठक ने बताया कि पिछले दो वर्षों से देवरिया जिले में ऐसे लावारिस मृतकों की अस्थियों को एकत्रित किया जा रहा था, जिनका कोई परिजन या वारिस नहीं था। कई मामलों में अंतिम संस्कार तो कराया गया, लेकिन अस्थि विसर्जन करने वाला कोई नहीं था। ऐसे लोगों की अस्थियों को सुरक्षित रखकर उन्हें मां गंगा में विधिवत प्रवाहित करने का संकल्प लिया गया।
उन्होंने कहा कि यह केवल एक धार्मिक कार्य नहीं बल्कि मानवता की सेवा है। समाज के सबसे उपेक्षित और अकेले लोगों को मृत्यु के बाद भी सम्मानपूर्वक विदाई मिले, इसी भावना के साथ यह अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इस कार्य में देवरिया के समाजसेवी सुभाष पटेल का भी विशेष सहयोग रहा, जो निराश्रित और लावारिस मृतकों के अंतिम संस्कार में लगातार सहयोग करते हैं। संजय पाठक कहते हैं कि, हमारा प्रयास है कि जिन लोगों का इस दुनिया में कोई अपना नहीं है, उनकी आत्मा को भी शांति मिले और मां गंगा उन्हें मोक्ष प्रदान करें।
मानवता और सेवा का अनूठा उदाहरण
संस्था के अध्यक्ष अनिकेत गिरि ने कहा कि हरिद्वार में उनकी संस्था निराश्रित गौवंश की सेवा के साथ-साथ ऐसे मानवीय कार्यों में भी सक्रिय रहती है। उन्होंने बताया कि जब 350 से अधिक अस्थियों का सामूहिक विसर्जन किया गया तो वह क्षण बेहद भावुक था। ऐसा महसूस हुआ मानो उन अनगिनत आत्माओं को वर्षों बाद सम्मानपूर्वक विदाई मिल रही हो।
उन्होंने कहा कि समाज में अक्सर लावारिस लोगों को भुला दिया जाता है, लेकिन मृत्यु के बाद भी उनके सम्मान और आत्मिक शांति की जिम्मेदारी समाज की ही होती है। यही सोच इस अभियान की प्रेरणा है।
हरिद्वार की पवित्र गंगा में जब इन अस्थियों का विसर्जन हुआ, तो वह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि मानवता, संवेदनशीलता और सेवा का ऐसा उदाहरण था, जिसने यह संदेश दिया कि इंसानियत आज भी जीवित है। जिन लोगों का जीवन गुमनामी में बीता, उन्हें कम से कम अंतिम विदाई सम्मान और श्रद्धा के साथ मिले, यही इस पहल की सबसे बड़ी सफलता है।



