द लोकतंत्र/ नई दिल्ली डेस्क : Europe Heatwave यूरोप इन दिनों Heat Wave की चपेट में है। लगातार बढ़ते तापमान ने कई देशों में जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल फ्रांस में स्वास्थ्य अधिकारियों ने 24 जून से 27 जून के बीच हीट वेव से जुड़ी लगभग 1000 अतिरिक्त मौतों की जानकारी दी है। अतिरिक्त मौतों का अर्थ उन मौतों से है, जो सामान्य वर्षों में इसी अवधि के औसत से अधिक दर्ज की गई हैं। इस घटना ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी और इंसानी शरीर की तापमान सहने की सीमा की ओर खींचा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी केवल असुविधा का कारण नहीं बनती, बल्कि यह शरीर के सामान्य कामकाज को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। बुजुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोग हीट स्ट्रेस के सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि समय रहते बचाव के उपाय नहीं किए जाएं तो अत्यधिक गर्मी जानलेवा साबित हो सकती है।
वेट बल्ब तापमान क्या है और यह क्यों है महत्वपूर्ण?
मानव शरीर का सामान्य आंतरिक तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस होता है। जब बाहरी तापमान बढ़ता है, तो शरीर पसीना निकालकर खुद को ठंडा रखने की कोशिश करता है। पसीने का वाष्पीकरण शरीर की अतिरिक्त गर्मी को बाहर निकालने में मदद करता है, लेकिन जब वातावरण में नमी बहुत अधिक होती है तो यह प्रक्रिया प्रभावी नहीं रह जाती।
इसी कारण वैज्ञानिक “वेट बल्ब तापमान” (Wet Bulb Temperature) को हीट स्ट्रेस का सबसे सटीक पैमाना मानते हैं। यह तापमान केवल गर्मी ही नहीं, बल्कि हवा में मौजूद नमी को भी ध्यान में रखता है। लंबे समय तक 35 डिग्री सेल्सियस के वेट बल्ब तापमान को इंसानों के जीवित रहने की अधिकतम सीमा माना गया है। हालांकि हाल के शोध बताते हैं कि वास्तविक खतरा इससे पहले ही शुरू हो सकता है।
रिसर्च में सामने आई चेतावनी, नमी वाली गर्मी ज्यादा खतरनाक
पेन स्टेट यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के अनुसार, पूरी तरह स्वस्थ और युवा व्यक्ति भी लगभग 31 डिग्री सेल्सियस के वेट बल्ब तापमान में छह घंटे से अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसके बाद शरीर का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है और हीट स्ट्रोक, अंगों के फेल होने तथा मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों के लिए यह जोखिम और भी अधिक होता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि सूखी गर्मी और नमी वाली गर्मी में बड़ा अंतर होता है। यदि वातावरण शुष्क है तो पसीना तेजी से वाष्पित होकर शरीर को ठंडा रखता है। ऐसी स्थिति में इंसान सीमित समय के लिए 50 से 55 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान भी झेल सकता है। लेकिन यदि हवा में नमी अधिक हो तो 35 डिग्री सेल्सियस के आसपास का तापमान भी बेहद घातक साबित हो सकता है, क्योंकि पसीना सूख नहीं पाता और शरीर की गर्मी लगातार बढ़ती रहती है।
जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि के कारण भविष्य में हीट वेव की घटनाएं और अधिक गंभीर हो सकती हैं। ऐसे में लोगों को पर्याप्त पानी पीने, धूप में अनावश्यक रूप से बाहर जाने से बचने, हल्के कपड़े पहनने और अत्यधिक गर्मी के दौरान शरीर को ठंडा रखने जैसे उपाय अपनाने की सलाह दी जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम की समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है।



