द लोकतंत्र/प्रो. सुशील कुमार राय: जलवायु परिवर्तन, आज विश्वभर में खाद्य सुरक्षा के समक्ष उत्पन्न सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। निरंतर बढ़ती जनसंख्या के कारण प्रत्येक व्यक्ति के लिए पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन पहुँचाना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है। बढ़ता वैश्विक तापमान, अनियमित मौसम और पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण विश्व की खाद्य प्रणालियों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं।
जब मौसम बना खेती का सबसे बड़ा दुश्मन
वैश्विक तापवृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग), जो जलवायु परिवर्तन का सबसे प्रभावी सूचक है, वर्तमान में यह कृषि उत्पादकता में निरंतर गिरावट का एक प्रमुख कारण बन चुका है। बढ़ते तापमान के कारण अनियमित एवं असमान वर्षा, लंबे समय तक पड़ने वाला सूखा, विनाशकारी बाढ़ तथा बार-बार आने वाली भीषण लू जैसी परिस्थितियाँ फसलों की पैदावार को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही हैं। गेहूँ, धान (चावल) और मक्का जैसे प्रमुख खाद्यान्न जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं। बदलते मौसम के स्वरूप के साथ तालमेल बिठाने में किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन घट रहा है और खाद्य आपूर्ति बड़े पैमाने पर प्रभावित हो रही है। सोमालिया, इथियोपिया, युगांडा और मेडागास्कर जैसे देशों में बार-बार पड़ने वाले सूखे और वर्षा की विफलता ने फसलों एवं पशुधन को भारी क्षति पहुँचाई है, जिससे लाखों लोग भूख और कुपोषण का सामना कर रहे हैं।
महंगाई, भूख और कुपोषण का बढ़ता दायरा
जलवायु संबंधी आपदाएँ खाद्य असुरक्षा को और अधिक गंभीर बना रही हैं। इनके कारण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खाद्य पदार्थों की कीमतों में तीव्र वृद्धि होती है। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ता है, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर व्यय होता है। परिणामस्वरूप, विशेष रूप से विकासशील देशों में भूख और कुपोषण की समस्या लगातार बढ़ रही है। यदि स्थिति ऐसी ही बनी रही, तो आने वाले समय में विश्वभर में अरबों लोगों के खाद्य संकट का भयंकर सामना करना पड़ सकता है।
पशुधन और समुद्री संसाधनों पर संकट
जलवायु परिवर्तन पशुपालन और मत्स्य पालन के लिए भी एक गंभीर चुनौती बन गया है, जबकि ये दोनों क्षेत्र विश्वभर में अरबों लोगों की खाद्य सुरक्षा और आजीविका के प्रमुख आधार हैं। अत्यधिक गर्मी से पशुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे दूध उत्पादन और उनकी उत्पादकता में कमी आती है। इसी प्रकार, महासागरों के बढ़ते तापमान और अम्लीकरण के कारण समुद्री जैव विविधता प्रभावित हो रही है तथा अनेक मछली प्रजातियों की संख्या लगातार घट रही है। समुद्री तापमान में असामान्य परिवर्तन के कारण मछलियों के प्राकृतिक आवास और प्रवासन के प्रारूप बदल रहे हैं, जिससे विशेष रूप से तटीय समुदायों और मत्स्य उद्योगों के सामने गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।
सबसे अधिक प्रभावित गरीब और छोटे किसान
जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब और वंचित वर्गों पर पड़ रहा है। अनेक विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है, किंतु छोटे और सीमांत किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, सिंचाई सुविधाओं, फसल बीमा तथा अन्य आवश्यक संसाधनों तक पर्याप्त पहुँच प्राप्त नहीं है। परिणामस्वरूप, फसलों की विफलता और बढ़ती बेरोज़गारी उन्हें और अधिक गरीबी, भूख तथा अभाव के दुष्चक्र में धकेल रही है।
विस्थापन और सामाजिक तनाव की नई चुनौती
जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापवृद्धि के कारण बढ़ता जलवायु-प्रेरित विस्थापन तथा सामाजिक अस्थिरता भी एक उभरती हुई वैश्विक चुनौती है। खाद्य संकट, लंबे समय तक पड़ने वाला सूखा और पर्यावरणीय क्षरण लोगों को अपने घरों और समुदायों को छोड़ने के लिए विवश कर रहे हैं। इससे शहरों और उनके आसपास के क्षेत्रों पर अतिरिक्त जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है, जिससे संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा, सामाजिक तनाव और संघर्ष की स्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं। यदि समय रहते इन चुनौतियों का समाधान नहीं किया गया, तो यह सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं।
जलवायु-स्मार्ट कृषि ही भविष्य का रास्ता
इस संकट का प्रभावी समाधान सतत और जलवायु-अनुकूल खाद्य प्रणालियों के विकास में निहित है। जलवायु-स्मार्ट कृषि, जल संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन, खाद्य हानि और अपव्यय में कमी, सूखा-सहिष्णु एवं जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों का विकास और उन पर अधिक निवेश इस दिशा में अत्यंत आवश्यक कदम हैं। भविष्य में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी नवाचार, सतत कृषि पद्धतियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का समन्वित प्रयास अनिवार्य है।
साझा प्रयासों से सुरक्षित होगी खाद्य सुरक्षा
जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा और मानव कल्याण के लिए एक गंभीर वैश्विक चुनौती बन चुका है। इस चुनौती का सामना सरकारों, उद्योगों, वैज्ञानिकों और समाज के सभी वर्गों के सामूहिक प्रयासों से ही किया जा सकता है। यदि हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी की संसाधन-संपन्नता को सुरक्षित रखते हुए भूखमुक्त विश्व का निर्माण करना है, तो हमें टिकाऊ, समावेशी और जलवायु-अनुकूल खाद्य प्रणालियों को अपनाना होगा। यही मानवता हेतु अत्यधिक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य का सबसे प्रभावी मार्ग है।




