द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ (India US Tariff) लगाए जाने की आशंका के बीच एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन वाले रूस प्रतिबंध बिल को नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले प्रतिनिधि सभा में मंजूरी मिलने में मुश्किल आ सकती है। अगर बिल हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में अटकता है, तो भारत समेत रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का खतरा फिलहाल टल सकता है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सीनेट में भारी बहुमत से पास हो चुका यह बिल अब प्रतिनिधि सभा में राजनीतिक और नीतिगत विरोध का सामना कर रहा है। सांसदों के बीच इस बात को लेकर चिंता है कि प्रस्तावित कानून ट्रंप को टैरिफ लगाने की व्यापक शक्तियां दे सकता है। इसके अलावा अमेरिकी बाजार में तेल और गैस की कीमतों पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर भी सदस्यों के बीच चर्चा चल रही है।
प्रस्तावित कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े देशों के साथ-साथ रूस को ऊर्जा प्रतिबंधों से बचने में कथित तौर पर मदद करने वाले पांच प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। चीन, भारत और तुर्किये रूस से पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल हैं।
सीनेट में 86-11 से पास बिल, हाउस में बढ़ा विरोध
रूस पर प्रतिबंध लगाने वाला यह विधेयक दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पेश किया था। ग्राहम यूक्रेन के प्रमुख समर्थकों में माने जाते थे। अमेरिकी सीनेट ने पिछले महीने इसे 86-11 वोट से मंजूरी दी थी। हालांकि, प्रतिनिधि सभा में इसे उसी तरह का मजबूत समर्थन मिलता दिखाई नहीं दे रहा है। हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने संकेत दिया है कि 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि कांग्रेस चुनाव से पहले इस बिल को सदन में मतदान के लिए लाना मुश्किल हो सकता है। अगले दो महीनों में सांसदों के पास वॉशिंगटन में काम करने के लिए सीमित समय बचा है। ऐसे में बिल की प्रक्रिया चुनाव तक खिंचने की संभावना जताई जा रही है।
जॉनसन ने कहा कि सांसद रूस पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में हैं, लेकिन ऐसा फॉर्मूला तैयार करना जरूरी है जिसे प्रतिनिधि सभा में पर्याप्त समर्थन मिल सके। विदेश मामलों और टैक्स से जुड़ी समितियों में भी बिल के कुछ प्रावधानों को लेकर मतभेद सामने आए हैं। रिपब्लिकन सांसदों के बीच भी प्रस्तावित कानून को लेकर पूरी तरह एकराय नहीं है। यूक्रेन समर्थक अमेरिकी सांसद इस बिल को रूस पर दबाव बढ़ाने और यूक्रेन के प्रति अमेरिकी समर्थन प्रदर्शित करने के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखते हैं। हालांकि, अतिरिक्त टैरिफ शक्तियां मिलने के बाद ट्रंप वास्तव में उनका इस्तेमाल करेंगे या नहीं, इसे लेकर भी सवाल बने हुए हैं।
तेल की कीमतों का दबाव और ट्रंप की टैरिफ पावर बनी बड़ी चिंता
प्रतिनिधि सभा में बिल के रास्ते में सिर्फ राजनीतिक मतभेद ही चुनौती नहीं हैं। अमेरिकी सांसद यह भी आकलन कर रहे हैं कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाए जाने का असर अमेरिका में ईंधन और गैस की कीमतों पर कितना पड़ेगा। हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के चेयरमैन ब्रायन मस्त ने इस संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि भारत और रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले अन्य देशों को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, तो वैश्विक तेल बाजार पर दबाव बढ़ सकता है और कीमतें प्रभावित हो सकती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान युद्ध के बाद अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है और नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले ईंधन की कीमतें रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती हैं। पार्टी कांग्रेस में अपना बहुमत बनाए रखने की कोशिश कर रही है। प्रस्तावित कानून में ईरान पर पहले से लागू प्रतिबंधों को जारी रखने का प्रावधान भी शामिल है।
वहीं, डेमोक्रेट सांसदों की सबसे बड़ी चिंता ट्रंप को मिलने वाली अतिरिक्त टैरिफ शक्तियों को लेकर है। हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के वरिष्ठ डेमोक्रेट सांसद ग्रेगरी मीक्स ने कहा कि वह ऐसे कानून का समर्थन नहीं कर सकते, जिससे राष्ट्रपति को मौजूदा अधिकारों से आगे जाकर व्यापक टैरिफ लगाने की शक्ति मिल जाए। डेमोक्रेट सांसद ब्रैड श्नाइडर ने भी सीनेट के बिल में मौजूद टैरिफ प्रावधान पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि वह किसी भी राष्ट्रपति को बिना पर्याप्त नियंत्रण के इतनी व्यापक टैरिफ शक्ति देने के पक्ष में नहीं हैं।
ऐसे में बिल का भविष्य अब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की राजनीतिक सहमति पर निर्भर करता है। अगर नवंबर चुनाव से पहले यह सदन में आगे नहीं बढ़ता है, तो भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर प्रस्तावित 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ का तत्काल खतरा कुछ समय के लिए टल सकता है। हालांकि, रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों और भारत-रूस तेल व्यापार को लेकर दबाव का मुद्दा आगे भी अमेरिकी राजनीति में महत्वपूर्ण बना रह सकता है।




