द लोकतंत्र : भारत में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के साथ डिमेंशिया के मामलों में भी बड़ी वृद्धि होने का अनुमान है। एक अध्ययन के अनुसार, अगर डिमेंशिया की मौजूदा दर में बदलाव नहीं होता है, तो भारत में इस बीमारी से प्रभावित लोगों की संख्या 2036 तक बढ़कर करीब 1.69 करोड़ हो सकती है। यह संख्या मौजूदा अनुमान से लगभग दोगुनी है।
Dementia ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति की याददाश्त, सोचने-समझने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता धीरे-धीरे प्रभावित हो सकती है। उम्र बढ़ना इसका एक प्रमुख जोखिम कारक है। भारत में बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ रही है, इसलिए आने वाले वर्षों में इस बीमारी से जुड़े मामलों और देखभाल की जरूरत भी बढ़ सकती है।
अभी कितने लोग डिमेंशिया से प्रभावित हैं?
भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों पर किए गए एक राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन के मुताबिक, करीब 88 लाख बुजुर्ग डिमेंशिया के साथ रह रहे थे। अध्ययन में 2017 से 2020 के बीच जुटाए गए आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया था। इस आयु वर्ग में डिमेंशिया की दर करीब 7.4 प्रतिशत पाई गई थी।
अध्ययन में महिलाओं में डिमेंशिया की दर पुरुषों की तुलना में अधिक पाई गई। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बुजुर्गों में भी इसकी दर शहरों के मुकाबले ज्यादा थी। हालांकि, अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्थिति एक जैसी नहीं है।
2036 तक क्यों बढ़ सकती है संख्या?
डिमेंशिया के मामलों में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण भारत में बुजुर्ग आबादी का तेजी से बढ़ना है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी 2011 के करीब 10 करोड़ से बढ़कर 2036 तक लगभग 23 करोड़ हो सकती है।
ऐसे में डिमेंशिया की रोकथाम, समय पर पहचान और मरीजों की देखभाल स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे बन सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआती स्तर पर बीमारी की पहचान और जोखिम से जुड़े कारणों पर ध्यान देने से डिमेंशिया के बढ़ते प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
भारत में डिमेंशिया को लेकर जागरूकता और शुरुआती जांच पर भी जोर बढ़ रहा है। 2026 में प्रकाशित एक समीक्षा में भी भारत की तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी के साथ डिमेंशिया के बढ़ते बोझ को महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चुनौती बताया गया है।
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