द लोकतंत्र/ पटना : बिहार की राजनीति में लंबे समय से चुनावी रणनीतिकार के रूप में पहचान रखने वाले Prashant Kishor ने आखिरकार चुनावी मैदान में भी अपनी ताकत साबित कर दी है। पटना की प्रतिष्ठित बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जीत दर्ज कर उन्होंने यह संदेश दिया है कि वह सिर्फ चुनाव जिताने की रणनीति बनाने वाले विशेषज्ञ नहीं, बल्कि जनता का विश्वास जीतकर खुद भी चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं। उनकी यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि बांकीपुर सीट पिछले लगभग तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का मजबूत गढ़ रही है।
यह वही सीट है जहां से बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार चुनाव जीतते रहे थे। उनके राज्यसभा जाने के बाद सीट खाली हुई और उपचुनाव कराया गया। ऐसे में यह चुनाव बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। वहीं, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में यह पहला बड़ा चुनाव था, जिसमें पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इसलिए राजनीतिक विश्लेषक इस नतीजे को सिर्फ एक सीट का परिणाम नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक दिशा का संकेत मान रहे हैं।
32 राउंड तक कायम रही Prashant Kishor की बढ़त, बीजेपी का जीत का भरोसा टूटा
मतगणना शुरू होने के साथ ही शुरुआती रुझानों में प्रशांत किशोर ने बढ़त बना ली थी। इसके बाद 32 राउंड तक चली मतगणना में उन्होंने लगभग हर चरण में अपनी बढ़त बरकरार रखी। जैसे-जैसे मतों की गिनती आगे बढ़ी, जन सुराज और बीजेपी के बीच जीत का अंतर भी बढ़ता गया। दिलचस्प बात यह रही कि मतगणना शुरू होने से पहले बीजेपी कार्यकर्ताओं ने जीत का भरोसा जताते हुए जश्न की तैयारियां कर ली थीं और लड्डू तक मंगवा लिए गए थे। लेकिन कुछ ही राउंड के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। जहां जन सुराज के कार्यकर्ता जीत का जश्न मनाने लगे, वहीं बीजेपी खेमे में मायूसी छा गई।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस जीत के पीछे स्थानीय मुद्दों, जन सुराज के अभियान और राज्य सरकार के प्रति मतदाताओं की प्रतिक्रिया की अहम भूमिका रही। चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर ने लगातार यह संदेश देने की कोशिश की कि यह चुनाव केवल एक विधानसभा सीट का नहीं, बल्कि बिहार में नई राजनीति की शुरुआत का चुनाव है।
Prashant Kishor का रणनीतिकार से जननेता तक का सफर, जन सुराज को मिला बड़ा राजनीतिक आधार
प्रशांत किशोर का नाम देश के सबसे सफल चुनावी रणनीतिकारों में गिना जाता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित कई बड़े नेताओं के चुनावी अभियानों में उनकी रणनीति चर्चा का विषय रही है। हालांकि, जब उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया तो सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या दूसरों को चुनाव जिताने वाला रणनीतिकार खुद जनता का विश्वास जीत पाएगा? प्रशांत किशोर ने वर्ष 2024 में जन सुराज पार्टी का गठन किया था। इसके बाद 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने पूरी ताकत झोंकी, लेकिन पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। उस हार के बाद विपक्षी दलों और कई राजनीतिक विश्लेषकों ने उनकी राजनीतिक क्षमता पर सवाल उठाए थे।
अब बांकीपुर उपचुनाव की जीत ने उन तमाम सवालों का जवाब दे दिया है। इस जीत के साथ प्रशांत किशोर अब केवल रणनीतिकार नहीं, बल्कि जनता से सीधा जनादेश प्राप्त करने वाले नेता के रूप में भी स्थापित हो गए हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और राज्य सरकार की नीतियों पर लगातार हमला बोला और कहा था कि यदि बांकीपुर में बीजेपी हारती है तो इसका राजनीतिक संदेश पूरे बिहार में जाएगा। चुनाव परिणाम आने के बाद उनकी यह बात काफी हद तक सही साबित होती दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले बिहार की राजनीति में नए समीकरण तैयार कर सकता है। यह जीत जन सुराज के लिए मनोबल बढ़ाने वाली साबित हुई है, जबकि बीजेपी के लिए यह आत्ममंथन का अवसर मानी जा रही है। अब सबकी निगाहें इस बात पर होंगी कि क्या प्रशांत किशोर इस जीत को पूरे बिहार में राजनीतिक विस्तार में बदल पाते हैं।




