द लोकतंत्र/ नई दिल्ली डेस्क : अमेरिका और ईरान के बीच घोषित सीजफायर के कुछ ही घंटों बाद मिडिल ईस्ट में हालात फिर से बिगड़ते नजर आए हैं। संघर्ष विराम लागू होने के बावजूद दोनों पक्षों इजरायल-ईरान से हमलों की खबरें सामने आईं, जिससे इस समझौते की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही रोक दी, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ने की आशंका पैदा हो गई है।
यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस रूट्स में से एक है, और इसके बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका सीधा असर भारत समेत कई देशों की ऊर्जा जरूरतों पर पड़ सकता है।
इजरायल का सख्त रुख- ‘मिशन अभी अधूरा‘
इस बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका मिशन अभी पूरा नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि सीजफायर अमेरिका और इजरायल की सहमति से लागू किया गया था, लेकिन अभी कुछ अहम लक्ष्य बाकी हैं, जिन्हें या तो कूटनीतिक बातचीत के जरिए या फिर सैन्य कार्रवाई के माध्यम से हासिल किया जाएगा।
नेतन्याहू ने यह भी दावा किया कि इजरायल ने ईरान की मिसाइल उत्पादन क्षमता को काफी हद तक कमजोर कर दिया है और मौजूदा हमले पुराने हथियारों के जरिए किए जा रहे हैं। उनका यह बयान संकेत देता है कि इजरायल भविष्य में भी आक्रामक रुख बनाए रख सकता है।
ईरान की चेतावनी और क्षेत्रीय अस्थिरता
दूसरी ओर, ईरान ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि यदि लेबनान पर इजरायल के हमले जारी रहे, तो पूरे क्षेत्र में व्यापक जवाबी कार्रवाई की जाएगी। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से बातचीत कर सीजफायर उल्लंघन पर नाराजगी जताई। उन्होंने अमेरिका पर भी अविश्वास जताते हुए कहा कि उसका “धोखा देने का पुराना इतिहास” रहा है, जिससे मौजूदा समझौते की स्थिरता पर संदेह बढ़ गया है।
कुल मिलाकर, सीजफायर के बावजूद जारी हमले, बयानबाज़ी और रणनीतिक कदम यह संकेत दे रहे हैं कि मिडिल ईस्ट की स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। यदि हालात जल्द नहीं सुधरे, तो यह संघर्ष एक बार फिर बड़े युद्ध का रूप ले सकता है, जिसका असर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ेगा।

