द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : मध्य प्रदेश में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कांग्रेस नेता Meenakshi Natarajan को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र रद्द किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं निर्धारित हैं और ऐसे मामलों में चुनाव याचिका ही कानूनी उपाय माना जाता है।
यह मामला 9 जून 2026 को हुए मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव से जुड़ा है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर ने मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज कर दिया था। नामांकन निरस्त करने का आधार हैदराबाद की एक अदालत से संबंधित मामले का उल्लेख नामांकन दस्तावेजों में न किया जाना बताया गया था। इसके बाद नटराजन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले को चुनौती दी थी।
Meenakshi Natarajan केस पर कोर्ट ने अनुच्छेद 329 का हवाला देते हुए चुनावी मामलों में हस्तक्षेप से किया इनकार
इस मामले की सुनवाई जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चुनावी विवादों को लेकर पहले से स्थापित संवैधानिक व्यवस्था मौजूद है और अनुच्छेद 329 के तहत चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद अदालतों को हस्तक्षेप से बचना चाहिए। पीठ ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में सीधे न्यायिक हस्तक्षेप की अनुमति दी जाए तो चुनावी प्रक्रिया की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा नामांकन रद्द करना कानूनी रूप से उचित नहीं था। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत केवल उन मामलों का खुलासा आवश्यक होता है जिनमें किसी उम्मीदवार को दोषी ठहराया गया हो या उसके खिलाफ अदालत द्वारा आरोप तय किए गए हों। हैदराबाद की अदालत में संबंधित मामला अभी प्रारंभिक स्तर पर है और वहां केवल जवाब तलब किया गया था, इसलिए उसका खुलासा अनिवार्य नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने नहीं मानी कोई भी दलील, Meenakshi Natarajan को नहीं मिली राहत
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और अपने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए चुनाव याचिका का रास्ता ही अपनाया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके इस फैसले का प्रभाव भविष्य में दायर की जाने वाली किसी चुनाव याचिका पर नहीं पड़ेगा और याचिकाकर्ता वहां अपने सभी कानूनी तर्क प्रस्तुत कर सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनावी कानून और संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह निर्णय एक बार फिर स्पष्ट करता है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर संविधान में तय सीमाओं का पालन किया जाएगा और चुनावी विवादों का समाधान निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जाएगा।




