द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीति में एक बार फिर नेतृत्व को लेकर बहस तेज हो गई है। बीते एक दशक से यह लगभग तय माना जाता रहा है कि पार्टी के प्रधानमंत्री पद का चेहरा राहुल गांधी ही होंगे, लेकिन हालिया घटनाक्रम और बयानों ने इस धारणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासकर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या कांग्रेस भविष्य में अपने पीएम फेस को लेकर रणनीतिक बदलाव पर विचार कर रही है।
बोले मसूद – पहले प्रियंका गांधी को प्रधानमंत्री बना दीजिए
दरअसल, भाजपा की ओर से यह आरोप लगाए जाने पर कि कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा गाजा जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर तो मुखर रहती हैं, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति पर चुप्पी साधे रहती हैं, इमरान मसूद ने पलटवार करते हुए कहा कि ‘पहले प्रियंका गांधी को प्रधानमंत्री बना दीजिए, फिर देखिए वह इंदिरा गांधी की तरह कैसे जवाब देती हैं।’ इस एक पंक्ति ने कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में चल रहे मंथन को सार्वजनिक बहस में ला दिया।
इमरान मसूद के बयान को कांग्रेस की आधिकारिक लाइन नहीं माना जा सकता, लेकिन यह भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि ऐसे बयान यूं ही नहीं आते। जब उनसे यह सवाल किया गया कि अगर प्रियंका गांधी पीएम बनती हैं तो राहुल गांधी की भूमिका क्या होगी, तो उन्होंने कहा कि राहुल और प्रियंका को अलग-अलग देखना गलत है। “ये इंदिरा गांधी के पोता-पोती हैं, चेहरे की दो आंखें हैं,”—यह कथन दरअसल नेहरू-गांधी परिवार की संयुक्त राजनीति और कांग्रेस की पारंपरिक सोच को दर्शाता है।
नैरेटिव गढ़ने वाला नेता चुनावी सफलता की गारंटी नहीं
राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा पर नजर डालें तो वह लगातार चुनावी असफलताओं के बावजूद कांग्रेस के सबसे बड़े वैचारिक चेहरे बने रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा के जरिए उन्होंने पार्टी को वैचारिक धार देने की कोशिश की और सामाजिक-राजनीतिक विमर्श को नए सिरे से परिभाषित किया। इसके बावजूद केंद्र की सत्ता तक न पहुंच पाना कांग्रेस के भीतर यह सवाल पैदा करता रहा है कि क्या नैरेटिव गढ़ने वाला नेता ही चुनावी सफलता की गारंटी भी बन सकता है।
दूसरी ओर प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीति अपेक्षाकृत कम समय में अधिक प्रभाव छोड़ती दिखी है। उनकी भाषा, आक्रामकता और सड़क की राजनीति ने उन्हें पार्टी का एक सशक्त जननेतृत्व वाला चेहरा बनाया है। हालांकि, उन्होंने अब तक स्वयं को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में कभी औपचारिक रूप से प्रस्तुत नहीं किया है। पार्टी नेतृत्व भी सार्वजनिक तौर पर यही कहता आया है कि कांग्रेस व्यक्ति-केंद्रित नहीं, बल्कि सामूहिक नेतृत्व में विश्वास रखती है।
इमरान मसूद के बयान के मायने क्या?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इमरान मसूद का बयान कांग्रेस द्वारा पीएम फेस बदलने की किसी औपचारिक प्रक्रिया का संकेत नहीं है, बल्कि यह भाजपा के हमलों के जवाब में दिया गया एक सियासी काउंटर है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कांग्रेस अब केवल एक चेहरे के सहारे आगे बढ़ने की रणनीति पर निर्भर नहीं रहना चाहती। पार्टी के भीतर यह सोच मजबूत हो रही है कि आने वाले चुनावों में मुद्दे, संगठन और गठबंधन तीनों निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
फिलहाल कांग्रेस ने न तो राहुल गांधी को पीएम फेस की दौड़ से बाहर किया है और न ही प्रियंका गांधी को उस भूमिका के लिए आगे बढ़ाया है। लेकिन राजनीति में संकेत अक्सर घोषणाओं से पहले आते हैं। इमरान मसूद का बयान भी ऐसा ही एक संकेत माना जा रहा है, जिसने कांग्रेस की भावी रणनीति को लेकर अटकलों को हवा दे दी है।
कुल मिलाकर, सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस ने पीएम कैंडिडेट बदल दिया है या नहीं, बल्कि यह है कि पार्टी आने वाले समय में किस राजनीतिक कथा के साथ जनता के बीच जाएगी। क्या वह राहुल गांधी की वैचारिक यात्रा को ही सत्ता की राह बनाएगी, या प्रियंका गांधी की जनभावनात्मक राजनीति को भी राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका देगी। इसका जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में है, लेकिन बहस ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर मंथन अब भी जारी है।

