द लोकतंत्र/ सुदीप्त मणि त्रिपाठी : पत्रकार की पहचान उसके गले में लटकते प्रेस कार्ड से नहीं होती, न ही उस संस्थान की ऊँची इमारतों से जहाँ वह कार्यरत है। उसकी पहचान उस प्रश्न से होती है जिसे वह पूछता है, उस अन्याय से होती है जिसे वह उजागर करता है और उस उत्तरदायित्व से होती है जिसे वह समाज के प्रति स्वीकार करता है। इधर कुछ समय से सोशल मीडिया पर एक विचित्र बहस चल रही है असली पत्रकार बनाम नकली पत्रकार। यह बहस जितनी लोकप्रिय है, उतनी ही सतही भी। क्योंकि इसमें सबसे मूल प्रश्न ही अनुपस्थित है। प्रश्न यह नहीं है कि असली कौन है और नकली कौन। प्रश्न यह है कि पत्रकार होने का नैतिक अर्थ कौन निभा रहा है?
पत्रकार की प्रचलित परिभाषा हमें बताती है कि पत्रकारिता का उद्देश्य Inform, Educate and Entertain अर्थात सूचना देना, शिक्षित करना और मनोरंजन करना है। यह परिभाषा आज के औद्योगिक मीडिया उद्योग के लिए सुविधाजनक हो सकती है, लेकिन पत्रकारिता का सम्पूर्ण दर्शन नहीं है। पत्रकारिता कभी भी केवल सूचना का व्यापार नहीं रही। वह तो सदैव से समाज के विवेक की अभिव्यक्ति रही है।
स्वतंत्रता आंदोलन के समय पत्रकारिता एक मिशन थी। वह सत्ता से विज्ञापन नहीं मांगती थी, सत्ता से प्रश्न पूछती थी। उसका उद्देश्य बाजार नहीं, समाज था; लाभ नहीं, लोकहित था। आज पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा एक पेशा है, और पेशे के अपने व्यावसायिक तर्क होते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब व्यवसाय, उत्तरदायित्व पर भारी पड़ने लगे; जब टीआरपी, सत्य से बड़ी हो जाए; जब क्लिक, चरित्र से अधिक मूल्यवान हो जाए। यही कारण है कि आज ‘असली’ और ‘नकली’ पत्रकारों की बहस दिशाहीन प्रतीत होती है।
पत्रकार वह है जो समाज के शोर में दब गई आवाज़ सुन सके
यदि कोई व्यक्ति किसी छोटे यूट्यूब चैनल, फेसबुक पेज या स्वतंत्र डिजिटल मंच के माध्यम से समाज की वास्तविक समस्याओं को ईमानदारी से सामने ला रहा है, सत्ता और जनता के बीच छूट गए प्रश्नों को उठा रहा है, वंचितों की आवाज़ बन रहा है, तो उसे केवल इसलिए पत्रकार मानने से इंकार नहीं किया जा सकता कि उसके पास किसी बड़े मीडिया संस्थान का नियुक्ति-पत्र नहीं है। इसके विपरीत, यदि किसी प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान का पहचान-पत्र किसी ऐसे व्यक्ति के गले में लटक रहा है जिसका वास्तविक कर्म ब्लैकमेलिंग, लॉबिंग, दलाली या प्रभाव का व्यापार है, तो वह केवल संस्थान की पहचान से पत्रकार नहीं हो जाता। पत्रकारिता का वस्त्र पहन लेने से पत्रकारिता का चरित्र प्राप्त नहीं होता।
सच तो यह है कि प्रेस कार्ड आज कई बार पेशे का प्रमाण कम और पहुँच का ‘वीआईपी पास’ अधिक बन गया है। ऐसे लोग भी इसकी आड़ लेते दिखाई देते हैं जिनका उद्देश्य सूचना नहीं, सुविधा है; जनहित नहीं, व्यक्तिगत लाभ है। यह पत्रकारिता का संकट नहीं, पत्रकार शब्द की गरिमा का संकट है। पत्रकार की परिभाषा किसी माध्यम से निर्धारित नहीं होती। माध्यम बदलते रहते हैं। कभी हस्तलिखित पर्चे थे, फिर समाचार पत्र आए, उसके बाद रेडियो, टेलीविजन और अब डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म। आने वाले समय में शायद कोई और माध्यम होगा। लेकिन पत्रकारिता का धर्म नहीं बदलेगा।
पत्रकार वह है जो समाज के शोर में दब गई आवाज़ सुन सके। पत्रकार वह है जो सत्ता और विपक्ष, दोनों के बीच मौजूद उस धूसर क्षेत्र को देखने का साहस रखे जहाँ अक्सर सबसे बड़े सच छिपे होते हैं। पत्रकार वह है जो लोकप्रिय होने से पहले प्रामाणिक होने की चिंता करे। पत्रकार वह है जिसकी बौद्धिकता उसे प्रश्न पूछना सिखाए, जिसकी संवेदना उसे पीड़ा महसूस कराए और जिसकी नैतिकता उसे किसी भी शक्ति के सामने झुकने से रोके। पत्रकारिता केवल सूचना का संप्रेषण नहीं है; यह समाज के नैतिक विवेक का सार्वजनिक अभ्यास है। यह लोकतंत्र का ऐसा दर्पण है जिसमें सत्ता भी स्वयं को देखती है और समाज भी।
‘असली’ और ‘नकली’ पत्रकार की बहस अपने मूल में एक वर्चस्ववादी विमर्श
दरअसल, ‘असली’ और ‘नकली’ पत्रकार की बहस अपने मूल में एक वर्चस्ववादी विमर्श भी है। डिजिटल माध्यमों ने सूचना के उत्पादन और प्रसार का लोकतंत्रीकरण किया है। अब समाचारों का प्रवाह केवल बड़े मीडिया संस्थानों के हाथों में सीमित नहीं रहा। ऐसे में स्वाभाविक है कि वर्षों से संस्थागत पत्रकारिता से जुड़ा एकाधिकार चुनौती का सामना कर रहा हो। इस चुनौती के बीच ‘कौन पत्रकार है और कौन नहीं’ का प्रश्न अचानक अत्यधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया। किंतु यह प्रश्न जितना दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक सतही है। लोकतंत्र का वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि पत्रकार किस माध्यम से काम करता है; वास्तविक प्रश्न यह है कि वह पत्रकारिता के नैतिक मापदंडों पर कितना खरा उतरता है।
यदि कोई व्यक्ति मोबाइल फ़ोन के माध्यम से तथ्यपरक, सत्यापित और जनहित से जुड़े प्रश्न उठा रहा है, तो केवल इसलिए उसे पत्रकार मानने से इंकार नहीं किया जा सकता कि उसके पास किसी बड़े संस्थान का परिचय-पत्र नहीं है। उसी प्रकार, यदि किसी प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान का प्रतिनिधि सत्य से विमुख होकर ब्लैकमेलिंग, लॉबिंग, दलाली या सत्ता-समीपता का उपकरण बन जाता है, तो केवल प्रेस कार्ड उसे पत्रकार नहीं बना देता। पत्रकारिता की कसौटी संस्थान नहीं, आचरण है; माध्यम नहीं, मर्यादा है; पहुँच नहीं, सार्वजनिक उत्तरदायित्व है।
इसलिए ‘असली पत्रकार कौन?’ का प्रश्न अधूरा है। सही प्रश्न यह है, पत्रकार शब्द के साथ जुड़ी नैतिक जिम्मेदारियों को कौन निभा रहा है? कौन तथ्यों के प्रति ईमानदार है? कौन सत्ता से निकटता नहीं, सत्य से निकटता चाहता है? कौन जनता के विश्वास को अपने निजी स्वार्थ से ऊपर रखता है? जिस दिन इस कसौटी पर पत्रकारों का मूल्यांकन शुरू होगा, उस दिन असली और नकली का विवाद स्वतः समाप्त हो जाएगा। क्योंकि अंततः पत्रकारिता किसी संस्थान की मुहर से नहीं, बल्कि चरित्र की विश्वसनीयता से प्रमाणित होती है। पत्रकार होना एक पद नहीं, एक सार्वजनिक उत्तरदायित्व है। और जो इस उत्तरदायित्व को ईमानदारी से निभाता है, वही पत्रकार है चाहे उसका मंच अखबार हो, कैमरा हो, यूट्यूब हो या केवल एक मोबाइल फोन।



