Advertisement Carousel
Blog Post

Journalist Intellectual Property: पत्रकार की कलम से बनते हैं मीडिया संस्थान, ख़बरनवीसों की सबसे बड़ी लड़ाई सिर्फ़ वेतन की नहीं ‘स्वामित्व’ की होनी चाहिए

Media organizations are built by the journalist's pen; the biggest battle for news professionals should not be over wages, but over 'ownership'.

द लोकतंत्र/ सुदीप्त मणि त्रिपाठी : Journalist Intellectual Property: शब्दों का श्रम, श्रम का स्वामित्व दरअसल पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी उसकी बुद्धि है, लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसी पर उसका सबसे कम अधिकार होता है। मैं ऐसे परिवार से आता हूँ जिसने कभी ज़मीन-जायदाद या कारोबार के सहारे जीवन नहीं जिया। हमारा सबसे बड़ा संसाधन हमेशा हमारी बुद्धि रही। मेरे पिता पत्रकार थे। घर का चूल्हा भी उनकी कलम से जलता था और भविष्य की उम्मीदें भी उसी से जुड़ी थीं।

इसलिए पत्रकारिता मेरे लिए केवल एक पेशा नहीं है, जीवन का अनुभव है। मैंने बहुत करीब से देखा है कि जब किसी पत्रकार की नौकरी जाती है, तो वह सिर्फ बेरोजगार नहीं होता बल्कि उसके साथ पूरे परिवार की आर्थिक स्थिरता दरकने लगती है। घर का बजट बिगड़ जाता है। स्कूल फीस चिंता बन जाती है। किराया, दवाइयां, बैंक की किश्तें और रोज़मर्रा के छोटे-छोटे खर्च अचानक पहाड़ जैसे लगने लगते हैं। जो व्यक्ति कल तक समाज के बड़े-बड़े प्रश्नों पर रिपोर्ट लिख रहा था, वह आज अपने ही घर की आर्थिक चिंता में घिर जाता है।

मैंने यह केवल देखा नहीं है। मैंने इसे जिया है। नौकरी खो देने वाले पत्रकार के सामने जो प्रश्न पहाड़ बनकर खड़े होते हैं वह यह कि अब आगे परिवार कैसे चलेगा? बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी? अगली आय कब आएगी? सम्मान कैसे बचा रहेगा? ये प्रश्न मेरे लिए किताबों में पढ़े हुए विषय नहीं हैं। मैं उन परिस्थितियों का साक्षी भी रहा हूँ और उनका सहभागी भी। यही कारण है कि जब मैंने सुना कि एक झटके में 120 मीडिया कर्मियों की नौकरी चली गई, तो मेरे भीतर किसी तरह का आश्चर्य का भाव नहीं आया। हां, बस एक पुराना दर्द फिर से जीवित हो गया क्योंकि मैं यह भली भांति जानता हूँ कि यह समाचार केवल 120 लोगों की बेरोज़गार होने का नहीं, बल्कि 120 परिवारों की अनिश्चितता का समाचार है।

और, यह संकट केवल छंटनी तक सीमित नहीं है। कल्पना कीजिए, कोई पत्रकार किसी सड़क दुर्घटना का शिकार हो जाए। किसी गंभीर बीमारी के कारण महीनों तक काम न कर पाए। किसी रिपोर्टिंग के दौरान घायल हो जाए। उस समय क्या होता है? न्यूज़रूम चलता रहता है। ख़बरें बनती रहती हैं, स्टोरी प्रकाशित होते रहते हैं, संस्थान अपनी गति से आगे बढ़ रहा होता है। लेकिन उस पत्रकार का परिवार ठहर जाता है और जीवन की सबसे कठिन लड़ाई अकेले लड़ता है।

चूंकि इन परिस्थितियों से मेरा वास्ता बचपन से रहा है ऐसे में मेरे मन में एक प्रश्न सदैव चलता रहा है कि जिस व्यक्ति ने अपनी बुद्धि, अपनी ईमानदारी, अपने समय और अपने साहस से किसी मीडिया संस्थान को खड़ा करने में योगदान दिया, संकट की घड़ी में उसका अपना सहारा कौन है? एक पत्रकार अपनी सबसे मूल्यवान संपत्ति यानी अपने विचार, अपनी रिपोर्ट, अपने विश्लेषण और अपने श्रम को किसी संस्थान को सौंप देता है। वही सामग्री वर्षों तक संस्थान के लिए राजस्व उत्पन्न करती रहती है। लेकिन उसका निर्माता केवल एक मासिक वेतन तक सीमित रह जाता है। नौकरी समाप्त हुई, तो उसकी आय भी समाप्त।

मुझे हमेशा लगा कि यह केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि बौद्धिक अन्याय भी है। पत्रकार एक कर्मचारी भर नहीं है; वह बौद्धिक संपदा का सृजनकर्ता है। उसकी रिपोर्ट, उसका विश्लेषण और उसकी खोज उसी की रचना है। यदि दुनिया के अन्य रचनात्मक क्षेत्रों में लेखक, संगीतकार, शोधकर्ता और आविष्कारक अपनी रचनाओं से दीर्घकालिक आय प्राप्त कर सकते हैं, तो पत्रकारिता में यह विचार असंभव क्यों माना जाए?

शायद इन्हीं अनुभवों ने मेरे भीतर एक संकल्प जन्म दिया। मैंने बहुत पहले तय कर लिया था कि यदि कभी अपना मीडिया संस्थान बनाऊँगा, तो वह केवल लाभ कमाने वाला व्यवसाय नहीं होगा। वह ऐसा मंच होगा जो समाज की आवाज़ बनने के साथ-साथ उन पत्रकारों के भविष्य की भी चिंता करेगा, जो अपना वर्तमान समाज के नाम कर देते हैं।

इसी सोच से मैनें मेरे संस्थान द लोकतंत्र – The Loktantra के लिए एक मॉडल तैयार किया है। यह सिर्फ आर्थिक मॉडल नहीं है, एक संकल्प है जो पत्रकारों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है। हालांकि मेरा संस्थान अभी शिशु अवस्था में है लेकिन यह वयस्क भी होगा, जिम्मेदार भी और जवाबदेह भी। मेरा प्रयास है कि जो पत्रकार हमारे साथ जुड़कर काम करें उनकी बौद्धिक संपदा का पूरा सम्मान होना चाहिए। हमारी सोच सरल है यदि किसी पत्रकार की बनाई हुई स्टोरी, वीडियो या अन्य मौलिक सामग्री भविष्य में भी आय अर्जित करती है, तो उस आय में उसका हिस्सा भी बना रहना चाहिए। चाहे वह उस समय हमारे साथ कार्यरत हो या नहीं।

क्योंकि नौकरी एक दिन समाप्त हो सकती है, लेकिन किसी पत्रकार की मेहनत का मूल्य उसके नियुक्ति पत्र की अवधि से तय नहीं होना चाहिए। मेरा विश्वास है कि पत्रकारों के मध्य अगला बड़ा विमर्श वेतन नहीं, स्वामित्व का होगा। और यकीन मानिए जिस दिन पत्रकार अपनी बौद्धिक संपदा को लेकर सजग हो जाएगा और उसका वास्तविक भागीदार बन जाएगा, उस दिन शायद किसी छंटनी की खबर केवल नौकरी जाने की खबर होगी, जीवन बिखर जाने की नहीं। और शायद उसी दिन पत्रकारिता अपने सबसे न्यायपूर्ण स्वरूप के सबसे करीब होगी।

Sudeept Mani Tripathi

Sudeept Mani Tripathi

About Author

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से हिंदी पत्रकारिता में परास्नातक। द लोकतंत्र मीडिया फाउंडेशन के फाउंडर । राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लिखता हूं। घूमने का शौक है।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like

The Nehru Era: From Gandhi's ideals and ideas to the foundation of modern, democratic and socialist India
Blog Post

नेहरू युग: गांधी के आदर्शों और विचारों से आधुनिक, लोकतांत्रिक और समाजवादी भारत की नींव तक का सफर

द लोकतंत्र/ सौरभ त्यागी : भारत की आजादी का इतिहास केवल राजनीतिक संघर्षों और स्वतंत्रता आंदोलनों का ही नहीं, बल्कि
Pakistani serials have taken over the hearts of Indian viewers, why is the magic of Indian serials ending?
Blog Post

भारतीय दर्शकों के दिलों में पाकिस्तानी सीरियल्स का चढ़ा खुमार, क्यों ख़त्म हो रहा हिंदुस्तानी धारावाहिकों का जादू

द लोकतंत्र/ उमा पाठक : हाल के दिनों में, भारतीय दर्शकों के बीच पाकिस्तानी सीरियल्स का क्रेज़ बढ़ा है। ख़ासतौर