Advertisement Carousel
Blog Post

महानगरीय आबो-हवा से रूठ गया है सावन का ‘पपिहरा’

The *Papihara* of the monsoon season has turned away from the metropolitan atmosphere.

द लोकतंत्र/ नूतन मिश्रा : श्रावण का पुनीत मास आरम्भ हो गया है। सावन आते ही प्रकृति प्रफुल्लित हो उठती है धरती की हरीतिमा गाने लगती है मोर नृत्य करने लगते हैं, प्रकृति का कण कण और हमारा मन मयूर नाच उठता है, गा उठता है सावन की हरीतिमा का गान..सुप्रसिद्ध ललित निबंधकार हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने एक बहुचर्चित निबंध में लिखा है कि “बसंत तो आ गया लेकिन मन में कोई उल्लास नहीं है” सचमुच सावन तो आ गया लेकिन अब महानगर से लेकर गाँव तक में ज्यादातर लोगों को सावन की ख़बर ही नहीं है। सावन का दूत पपिहरा अब सावन के आगमन की सूचना ही नहीं देता। लगता है सावन का पपिहरा महानगरीय आबो-हवा के बदलने से रूठ गया है। आज ना तो कोयल की कूक सुनायी दे रही है और ना ही पेड़ों पर झूले दिख रहे हैं। आज के समय में सावन कितना हमें प्रफुल्लित करता है पपीहे के बोल हमें कितना सुनाई देता है क्या सावन का उत्सव आज भी हम उसी तरह से मनाते हैं जैसा पहले मनाते थे?

ना तो वो बादल हैं, न बादलों के वे रंग, न हरियाली…

इस संदर्भ में महानगर के विभिन्न वर्ग के लोगों से जब बात हुई तो सावन के बदलते स्वरूप पर कुछ प्रतिक्रियाएं उजागर हुईं। नोएडा में एक मल्टी नेशनल कंपनी में कार्यरत नेहा पाण्डेय से जब मेरी बात हुई तो उन्होंने बताया आज के माहौल को मैं देखूँ तो मुझे सावन बिल्कुल ही नहीं दिखाई देता। मैं नोएडा में रहती हूं तो कह सकती हूं कि कंक्रीट के इस जंगल में तो बिल्कुल ही नहीं। ना तो वो बादल हैं, न बादलों के वे रंग, न हरियाली, न पेड़-पौधे। गांवो में जाएं तो दिन में कहीं कहीं झूलों पर झूलते बच्चे दिख जाते हैं।

कहीं कहीं गांवो में भी रात्रि को लगता है कि सावन आ गया है क्योंकि दूर से कजरी गाने की आवाज़ कभी-कभी सुनाई दे जाती है। आज लोगों के दिलों में तो सावन है लेकिन इस भाग-दौड़ भरे जीवन में उसे प्रदर्शित करने के लिए किसी के पास न तो वक़्त है और ना ही वह पुरानी वाली सावनी उल्लास। एक मुख्य कारण ये भी है कि कटते वृक्ष और टूटते पहाड़.. इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इस आधुनिकता की दौड़ में, विकास के नाम पर हम स्वयं को ही हानि पहुंचा रहे हैं, प्रकृति से खिलवाड़ हमें बहुत महंगा पड़ने वाला है।

साहित्यकार आलोचक व दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के रिटायर्ड प्रोफेसर अरविंद त्रिपाठी इस संदर्भ में कहते हैं कि दरअसल ऋतुएं नहीं बदली बल्कि आज का मनुष्य ही बदल गया है, वह भाग-दौड़ भरे इस जीवन में इस कदर घिर गया है कि उसे घिरे हुए बादल देखने की फ़ुर्सत ही नहीं है। ये विसंगति शहरी जीवन तक ही सीमित नहीं है। धीरे-धीरे लोक जीवन की संस्कृति में भी प्रकृति के प्रति उत्साह कम होता जा रहा है।

इसकी क्या वजहें है ये एक समाजशास्त्री बहस और विचार का मुद्दा है, लेकिन आमतौर पर इसमें शक नहीं कि आज का मनुष्य प्रकृति से अपने रिश्ते को ख़त्म करने पर आमादा है। तभी तो उसे मुंडेर पर टेरता कागा, पिछवाड़े से बोलती कोयल और हरे-भरे पेड़ों पर बैठे पपीहे के बोल नहीं सुनायी देते। आज के व्यस्त जीवन में हमारे घरों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमो ने इस तरह से घेर रखा है कि हम आहाते में गा रही कोयल की कूक को नज़र अंदाज करने लगे हैं।

जब सावन आता है तो हमें अपने समय का सावन याद आता है

गृहणी मधु सिन्हा से मेरी बात हुई तो उन्होंने कहा कि जब सावन आता है तो हमें अपने समय का सावन याद आता है वो हरी हरी चूड़ियां, मेहंदी, झूला, कजरी गीत अब तो काफ़ी कुछ बदल गया है अब भी इन सारी चीजो से हम अपने शौक तो पूरे करते हैं लेकिन ये सब किटी पार्टियों के एक हिस्से में डालकर। एक और बदलाव आया है पूरा सावन शिव मय होता है पूजा पाठ से। अब भी होते हैं घर घर में रुद्राभिषेक जलाभिषेक लेकिन अब इसमें भाव कम और दिखावा ज्यादा महसूस होता है।

गोरखपुर विश्वविद्यालय के बॉटनी डिपार्टमेंट से शोध छात्रा सरगम पाण्डेय ने बताया की सावन का स्वरूप जो बदला है उसके जिम्मेदार कहीं न कहीं हम ख़ुद हैं। क्लाइमेटिक चेंज की वजह से आज हम सबसे खुशनुमा मौसम सावन के असली स्वरूप से दूर होते जा रहे हैं। विकास के नाम पर कटते विशालकाय पेड़ों को हम आप सभी देख रहे हैं तो प्रकृति का उससे नाराज़ होना तो स्वाभाविक है। हमारा दूषित पर्यावरण ही ऋतुओं में परिवर्तन का कारण है। हमें इस बारे में चेतना होगा।

दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर ध्यानेंद्र नारायण दूबे जी से जब बात हुई तो उन्होंने कहा मुझे लगता है कि पपीहे की ‘पी कहां’ उसके शुद्ध मनोभूमि की पुकार है, ख़ुशी का इज़हार है। मनुष्य चूंकि चेतनशील प्राणी है इसलिए वह इस इज़हार को अपनी तरह से ही बाँटता है। अगर वह खुश है, संतुष्ट है तो मगन मन चोला वह पी कहां पी कहां के उल्लास का स्वर देने लगता है और अगर वह भूखा, प्यासा व आकुल है तो पी कहां उसके लिए टीस बन जाती है। पपीहे की आवाज़ उसे भली तो बहुत लगती है लेकिन फिर भी उसे वह बरजने लगता है।

ये लरज और बरज ही हमारी लोक संस्कृति की थाती है सावनी आम के खटमिठ रस की तरह। ये बात अलग है कि आज के तकनीकी जीवन में हमे ‘रस’ का नया अर्थ मिल गया है, और वह लोक जीवन से कटकर ‘विरस’ हो गया है। आज भी जहां हरियाली है, सावन-भादो की रिमझिम फुहार है पपीहा वहां बोलता है, लेकिन सच्चाई ये ही है कि अब मानव यंत्र पर ज़्यादा निर्भर होता जा रहा है यंत्र आपका कार्य तो करेगा लेकिन भाव कहां से लाएगा। सावन तो अब भी अपने समय से ही आता है लेकिन चूंकि हम यंत्रवत हो गए हैं तो उसके उल्लास से वंचित होते जा रहे हैं।

इस विषय पर इन सबसे बातचीत करने के बाद मन में एक सवाल उठता है कि क्या वास्तव में प्रकृति हमसे नाराज़ है? जवाब मिलता है हां .. तो हम इस दिशा में क्या कर सकते हैं कि हमारा पर्यावरण शुद्ध हो ताकि हमारी ऋतुएं अपने वास्तविक सौंदर्य के साथ हमें हर्षोल्लासित कर सकें। सावन से हमारी विनती गुहार है कि वह आज के दिशाहीन सभ्य समाज को अपनी रिमझिम फुहारों से विशुद्ध सांस्कृतिक चेतना का एहसास कराए।

यह भी पढ़ें – Journalist Intellectual Property: पत्रकार की कलम से बनते हैं मीडिया संस्थान, ख़बरनवीसों की सबसे बड़ी लड़ाई सिर्फ़ वेतन की नहीं ‘स्वामित्व’ की होनी चाहिए

नूतन मिश्रा हिंदी की लेखिका एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे आकाशवाणी गोरखपुर में कैजुअल उद्घोषिका (Casual Announcer) के रूप में कार्यरत हैं तथा साहित्य, संस्कृति, पर्यावरण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर नियमित लेखन करती हैं। उनकी रचनाओं में भारतीय लोकजीवन, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं का प्रभावी चित्रण देखने को मिलता है।

Team The Loktantra

Team The Loktantra

About Author

लोकतंत्र की मूल भावना के अनुरूप यह ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां स्वतंत्र विचारों की प्रधानता होगी। द लोकतंत्र के लिए 'पत्रकारिता' शब्द का मतलब बिलकुल अलग है। हम इसे 'प्रोफेशन' के तौर पर नहीं देखते बल्कि हमारे लिए यह समाज के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही से पूर्ण एक 'आंदोलन' है।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like

The Nehru Era: From Gandhi's ideals and ideas to the foundation of modern, democratic and socialist India
Blog Post

नेहरू युग: गांधी के आदर्शों और विचारों से आधुनिक, लोकतांत्रिक और समाजवादी भारत की नींव तक का सफर

द लोकतंत्र/ सौरभ त्यागी : भारत की आजादी का इतिहास केवल राजनीतिक संघर्षों और स्वतंत्रता आंदोलनों का ही नहीं, बल्कि
Pakistani serials have taken over the hearts of Indian viewers, why is the magic of Indian serials ending?
Blog Post

भारतीय दर्शकों के दिलों में पाकिस्तानी सीरियल्स का चढ़ा खुमार, क्यों ख़त्म हो रहा हिंदुस्तानी धारावाहिकों का जादू

द लोकतंत्र/ उमा पाठक : हाल के दिनों में, भारतीय दर्शकों के बीच पाकिस्तानी सीरियल्स का क्रेज़ बढ़ा है। ख़ासतौर