द लोकतंत्र/नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन को गुरुवार को उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब उसके मंच से जुड़े दो चर्चित चेहरों—वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और AISA प्रमुख नेहा बोरा—के बयानों ने संगठन की रणनीति और उसके आंदोलन के स्वरूप को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए। एक ओर प्रशांत भूषण ने खुले तौर पर ‘रेजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन की बात कही, तो दूसरी ओर नेहा बोरा के एक वीडियो में बांग्लादेश के आंदोलन को भारत में चल रहे ‘जेन जी आंदोलन’ के लिए प्रेरणा बताते हुए बधाई देने का बयान सामने आया।
इन बयानों के सामने आने के बाद सत्तापक्ष ने CJP और उसके आंदोलन पर निशाना साधना शुरू कर दिया। बढ़ते राजनीतिक विवाद के बीच CJP प्रमुख अभिजीत दीपके को देर रात प्रेस कॉन्फ्रेंस कर संगठन की स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। दीपके ने दोनों बयानों से दूरी बनाते हुए दोहराया कि CJP का आंदोलन महात्मा गांधी और बाबा साहेब आंबेडकर के विचारों पर आधारित शांतिपूर्ण और अहिंसक आंदोलन है।
प्रशांत भूषण के ‘रेजीम चेंज’ बयान से बढ़ा विवाद
गुरुवार को प्रेस क्लब में CJP समेत कई संगठनों की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सरकार और चुनाव व्यवस्था को लेकर सवाल उठाते हुए ‘रेजीम चेंज’ की बात कही। भूषण ने कहा कि ‘हां, हम रेजीम चेंज चाहते हैं। यह इसी की लड़ाई है। रेजीम चेंज होकर ही रहेगा।’ उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी। भाजपा ने इसे CJP के आंदोलन के कथित उद्देश्य से जोड़ते हुए संगठन पर हमला तेज कर दिया। बयान पर विवाद बढ़ता देख CJP प्रमुख अभिजीत दीपके ने देर रात अपनी स्थिति स्पष्ट की।
उन्होंने कहा कि संगठन की मांग सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाकर एक निष्पक्ष व्यक्ति की नियुक्ति की है। दीपके ने कहा कि उनका संगठन चुनाव प्रक्रिया में जवाबदेही की मांग कर रहा है और उसका उद्देश्य सत्ता पलटना नहीं है। उन्होंने कहा, “हम यह तो नहीं कह रहे हैं कि सत्ता पलटनी है। हम तो बस यही कह रहे हैं कि ज्ञानेश कुमार को हटाओ और एक निष्पक्ष तरीके से नया मुख्य चुनाव आयुक्त बनाओ।”
नेहा बोरा के बांग्लादेश वाले बयान ने बढ़ाई मुश्किल
CJP के लिए दूसरी बड़ी परेशानी AISA प्रमुख नेहा बोरा के एक वीडियो से खड़ी हुई। वीडियो में बोरा कथित तौर पर भारत में चल रहे ‘जेन जी आंदोलन’ का जिक्र करते हुए कहती नजर आती हैं कि यह आंदोलन पहले बांग्लादेश में शुरू हुआ था और वहां के लोगों को भारत के लिए रास्ता दिखाने पर बधाई देती हैं। बांग्लादेश में हुए हिंसक घटनाक्रम के संदर्भ में दिए गए इस बयान को लेकर राजनीतिक विवाद और तेज हो गया। भाजपा ने इसे CJP के आंदोलन की विचारधारा और कथित उद्देश्य से जोड़ते हुए संगठन पर सवाल उठाए। हालांकि, अभिजीत दीपके ने नेहा बोरा के बयान से भी दूरी बनाने की कोशिश की।
उन्होंने किसी का नाम लिए बिना स्पष्ट किया कि CJP हिंसा के रास्ते में विश्वास नहीं करती। दीपके ने कहा, “भारत के पास महात्मा गांधी हैं। हम भारत के युवा हमेशा महात्मा गांधी की शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलेंगे।” उन्होंने AISF प्रमुख विराज देवांग का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर साझा किया, जिसमें भारत के युवाओं के लिए महात्मा गांधी के आंदोलन के मॉडल को पर्याप्त बताते हुए बांग्लादेश से प्रेरणा लेने की जरूरत नहीं होने की बात कही गई है।
‘शांति-शांति, गांधी-गांधी’ की लाइन पर CJP
गुरुवार के विवाद के बाद CJP अब अपने आंदोलन की सबसे बड़ी पहचान के तौर पर गांधीवादी और अहिंसक आंदोलन को सामने रख रही है। संगठन की ओर से लगातार यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि उसका उद्देश्य सरकार गिराना या सत्ता परिवर्तन करना नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और जवाबदेही के मुद्दे को उठाना है। दीपके ने अपने बयान में महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाएगा और किसी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं करता।
यानी गुरुवार को सामने आए दो बयानों ने CJP के सामने एक मुश्किल राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है—क्या आंदोलन केवल चुनावी जवाबदेही तक सीमित है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक लक्ष्य भी है? अभिजीत दीपके की आधी रात की प्रेस कॉन्फ्रेंस को इसी सवाल का जवाब देने और संगठन की छवि को नियंत्रित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
भाजपा ने साधा निशाना
भाजपा ने प्रशांत भूषण और नेहा बोरा के बयानों को लेकर CJP पर तीखा हमला बोला। भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने आरोप लगाया कि इन बयानों से संगठन की कथित मंशा सामने आ गई है। भाटिया ने आरोप लगाया कि आंदोलन से जुड़े नेताओं की बातें लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ हैं। उन्होंने ‘रेजीम चेंज’ और बांग्लादेश के संदर्भ को आधार बनाते हुए CJP के आंदोलन की मंशा पर सवाल उठाए। हालांकि, इन आरोपों के बीच CJP का नेतृत्व लगातार यह स्पष्ट करने में जुटा है कि उसका आंदोलन शांतिपूर्ण, अहिंसक और लोकतांत्रिक तरीके से चुनावी जवाबदेही की मांग तक सीमित है।
अब सवाल CJP की साख का
गुरुवार के घटनाक्रम ने CJP के सामने सिर्फ राजनीतिक चुनौती नहीं खड़ी की है, बल्कि उसके संदेश और नेतृत्व के बीच तालमेल पर भी सवाल उठाए हैं। एक तरफ संगठन गांधी और अहिंसा की बात कर रहा है, वहीं उसके मंच से जुड़े प्रमुख चेहरों के बयानों ने सत्ता परिवर्तन और बांग्लादेश के आंदोलन की चर्चा को केंद्र में ला दिया है। ऐसे में आने वाले दिनों में CJP के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह अपने आंदोलन का एजेंडा जनता के सामने कितनी स्पष्टता से रख पाती है और विवादित बयानों से पैदा हुई राजनीतिक धारणा को किस तरह बदलती है।
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