दी लोकतंत्र/डॉ . सुमित कुमार पाण्डेय: सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) जी! लद्दाख की बर्फ पिघलाने वाले, शिक्षा को नई राह दिखाने वाले, आपने जो तप छह महीने की गिरफ्तारी में झेला, वह सम्मान से परे है। पर अब जंतर-मंतर के मंच पर एक ऐसे “कॉकरोच” के साथ खड़े होकर जिसकी जड़ें बॉस्टन में हैं और जिसका पुराना पता आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया सेल में दर्ज है (पार्टी का पता नहीं लिख सकता, क्योंकि यह अब स्वयं “पार्टी” बन बैठा है), आप जो दांव खेल रहे हैं, वह चौसर युधिष्ठिर वाला लगता है। शकुनि की पासा-चाल में जीत का भ्रम रहता है, यथार्थ में हार सुनिश्चित है।
ध्येय स्पष्ट न हो, तो आंदोलन क्रांति नहीं
हाँ! बात वाजिब है। असंतोष सच्चा है। नीट का पर्चा लीक होना, परीक्षाओं की गरिमा का क्षरण, बेरोज़गार युवा को “तिलचट्टा” कहा जाना, यह पीड़ा वास्तविक है। पर पीड़ा की सच्चाई आंदोलन के मंतव्य की शुद्धता की गारंटी नहीं। अन्ना हज़ारे जनलोकपाल बिल मांग रहे थे, एक स्पष्ट, नामित, संविधान-सम्मत लक्ष्य। यह जनांदोलन सरकार गिराने के मनोरथ से चल रहा प्रतीत होता है, बिना यह बताए कि गिरने के बाद खड़ा कौन होगा। ध्येय स्पष्ट न हो, तो आंदोलन क्रांति नहीं, अवसरवाद की चौसर बन जाता है।

दिलचस्प यह है कि सरकार ने विरोध को कुचला नहीं, “एक बार की छूट” देकर मंच ही सौंप दिया। जो सरकार आंदोलन से भयभीत होती, वह इतनी उदारता क्यों दिखाती? जान पड़ता है, सरकार जानबूझकर अवसर दे रही है, ताकि आंदोलन अपने ही अंतर्विरोधों में उलझकर स्वयं फ्लॉप हो जाए। और भीड़ का घटता आंकड़ा यही कह रहा है। एक महीने पहले जो जनसैलाब था, वह अब मुट्ठी भर रह गया है।
ऑनलाइन बनाम भौतिक आंदोलन में फ़र्क़
यहीं असली भेद खुलता है, ऑनलाइन जेन-ज़ी आंदोलन और सड़क के भौतिक आंदोलन में। बीस लाख इंस्टाग्राम फॉलोअर जुटाना एक बात है, चालीस डिग्री की गर्मी में जंतर-मंतर पर डटे रहना दूसरी। भारत का जेन-ज़ी या तो सड़क पर उतरने का साहस नहीं रखता, या फिर सच यह है कि सरकार इतना बुरा प्रदर्शन भी नहीं कर रही कि लोग घर से निकलने को विवश हों। दोनों ही स्थितियों में, कॉकरोच पार्टी की चमक धीरे-धीरे बुझती नज़र आती है, ठीक वैसे ही जैसे इंडिया अगेंस्ट करप्शन के मंच से निकले अनेक नायक बाद में सत्ता के गलियारों में जज़्ब होकर अपनी मूल आत्मा खो बैठे थे।
अवसरवादी चौसर का खेल
वांगचुक जी, आपकी उपस्थिति इस अवसरवादी चौसर को नैतिक वैधता का चोला पहना देती है, यही सबसे अधिक कष्टप्रद है। जब धृतराष्ट्र की सभा में शकुनि पासे फेंकता है, तो भीष्म का मौन भी उतना ही दोषी माना जाता है जितना दुर्योधन का उन्माद। आपका मौन-समर्थन, जाने-अनजाने, उसी चुप्पी की श्रेणी में गिना जाएगा। जनता का भरोसा वैसे भी दिन-प्रतिदिन क्षीण होता जा रहा है; जब आदरणीय चेहरे भी अवसरवाद के मंच से जुड़ते दिखें, तो वह भरोसा और गहरे क्षरण की ओर बढ़ता है।
यतो धर्मः ततो जयः
फिर भी, निराशा अंतिम सत्य नहीं। हर चौसर की एक सीमा होती है, हर शकुनि की चाल एक दिन उजागर होती है। युधिष्ठिर हारे थे, पर हस्तिनापुर अंततः धर्म की ओर ही लौटा। जो आंदोलन सत्य और स्पष्ट ध्येय से नहीं, केवल असंतोष के सतही उभार से चलते हैं, वे भी कालचक्र में स्वयं को शुद्ध कर लेते हैं, या विलीन हो जाते हैं। भारत का युवा मूर्ख नहीं, वह प्रतीक्षा करना जानता है, पहचानना भी। यतो धर्मः ततो जयः, जहां धर्म है, वहीं विजय है। दांव सही घोड़े पर लगे, इतनी ही कामना है।



