द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : प्रसिद्ध शिक्षाविद, जलवायु कार्यकर्ता और लद्दाख के सामाजिक नेता Sonam Wangchuk ने अपनी 26 दिन लंबी भूख हड़ताल और उससे जुड़े घटनाक्रम पर पहली बार विस्तार से बात की है। हाल ही में NEET-UG पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में वांगचुक भी अपनी मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे थे। आंदोलन उस समय राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया था, जब दिल्ली पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से हटाकर जबरन अस्पताल ले गई थी। इसके बाद 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई ने भी देशभर में बहस छेड़ दी थी।
The Week को दिए एक इंटरव्यू में सोनम वांगचुक ने उन तमाम दावों को खारिज किया, जिनमें कहा जा रहा था कि सरकार के दबाव या किसी राजनीतिक दल की मध्यस्थता के कारण उन्होंने अपनी भूख हड़ताल समाप्त की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग थी।
‘सरकार नहीं, सरकार पर मेरा दबाव था’, Sonam Wangchuk ने अफवाहों को किया खारिज
सोनम वांगचुक ने इंटरव्यू में कहा कि यह कहना पूरी तरह गलत है कि सरकार ने उन पर दबाव बनाकर भूख हड़ताल खत्म करवाई। उन्होंने कहा, “अगर किसी पर दबाव था तो वह सरकार पर था, मुझ पर नहीं। जैसे-जैसे आंदोलन बड़ा होता गया, खासकर जंतर-मंतर से मुझे जबरन अस्पताल ले जाने और 20 जुलाई के संसद मार्च के बाद सरकार पर दबाव बढ़ गया था।”
उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से बातचीत की पहल किसी राजनीतिक दल के माध्यम से नहीं हुई, बल्कि खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों ने संपर्क किया। वांगचुक के अनुसार, सफदरजंग अस्पताल और बाद में मेदांता अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के अधिकारी उनसे मिलने आते थे और सरकार का संदेश पहुंचाते थे। उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने उनसे पूछा कि क्या वे कुछ लोगों से बातचीत करने के लिए तैयार हैं। इस पर उन्होंने स्पष्ट जवाब दिया कि वे किसी से भी संवाद करने को तैयार हैं। इसके बाद उन्हें बताया गया कि दो केंद्रीय मंत्री उनसे मिलने आने वाले हैं और उन्होंने बातचीत के लिए सहमति दे दी।
वांगचुक ने कहा कि लोकतंत्र में संवाद हमेशा संघर्ष से बेहतर रास्ता होता है, लेकिन सरकार को जनता की भावनाओं को समझने में अधिक संवेदनशील होना चाहिए।
‘देश को हर शहर में प्रोटेस्ट साइट चाहिए’, शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार की वकालत
सोनम वांगचुक ने कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि भारत में आज भी सड़क और संसद के बीच संवाद का रिश्ता पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत रहता है, जब जनता की आवाज संसद तक पहुंचे। उन्होंने सुझाव दिया कि देश के हर बड़े शहर में स्थायी प्रोटेस्ट साइट होनी चाहिए, जहां लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख सकें। उनके अनुसार, यदि सरकार विरोध की आवाज़ों को दबाती है तो समाज में केवल गुस्सा और असंतोष बढ़ता है। ऐसे मंच सरकार के लिए भी जनता का मूड समझने का माध्यम बन सकते हैं।
शिक्षा व्यवस्था पर बोलते हुए वांगचुक ने कहा कि केवल शिक्षा मंत्री का इस्तीफा पर्याप्त नहीं है। उनके मुताबिक, यह जवाबदेही स्वीकार करने की शुरुआत हो सकती है, लेकिन असली जरूरत पूरे शिक्षा तंत्र में व्यापक सुधार की है। उन्होंने कहा कि परीक्षा प्रणाली पर भी नए सिरे से विचार होना चाहिए। वांगचुक ने सुझाव दिया कि एक ही प्रश्नपत्र के बजाय समान कठिनाई स्तर वाले चार अलग-अलग प्रश्नपत्र तैयार किए जा सकते हैं, जिन्हें छात्रों को रैंडम तरीके से दिया जाए। उनका मानना है कि इससे पेपर लीक जैसी घटनाओं की संभावना काफी कम हो जाएगी।
सोनम वांगचुक ने कहा कि देश को केवल परीक्षा प्रणाली नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र में बदलाव की जरूरत है, जो आने वाली पीढ़ी को तैयार करता है। उनके अनुसार, शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीकी सुधार ही भविष्य में पेपर लीक जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान बन सकते हैं।




