अभिषेक पांडेय रूपक : कांग्रेस की राजनीति इन दिनों एक अजीब से चक्र में घूमती दिखाई दे रही है। कभी लोकतंत्र खतरे में होने का दावा, कभी Rahul Gandhi द्वारा वोट चोरी का आरोप, कभी संसद के भीतर हंगामा और कभी संसद के बाहर मॉक संसद। इसके बाद बड़े-बड़े राजनीतिक मंच, आक्रामक भाषण और मीडिया में सुर्खियां। लेकिन इस पूरे राजनीतिक शोर के बीच एक सवाल लगातार अनुत्तरित है कि कांग्रेस के पास देश को देने के लिए अपना विजन क्या है?
रामलीला मैदान में आयोजित रैली को कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने का बड़ा अवसर बनाया। विपक्षी दलों के नेता एक मंच पर आए, राहुल गांधी ने अपने आरोप दोहराए और पार्टी ने इसे लोकतंत्र की लड़ाई का नाम दिया। लेकिन किसी आयोजन को ऐतिहासिक बता देने भर से वह ऐतिहासिक नहीं हो जाता। राजनीतिक ताकत का असली पैमाना मंच की भव्यता, माइक की आवाज या नेताओं की संख्या नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है जो फ़िलहाल न कांग्रेस के पास है, न राहुल गांधी के पास और न ही विपक्ष के किसी अन्य नेता के पास। कांग्रेस ने रामलीला मैदान में राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी एकजुटता का बड़ा प्रदर्शन करने की कोशिश जरूर की। लेकिन, इस सियासी जमावड़े के बीच सवाल कांग्रेस की अपनी ताकत पर उठे कि क्या पार्टी अब अपने दम पर भीड़ जुटाने और संगठन की शक्ति दिखाने में सक्षम है?
मॉक संसद बनाया, मॉक प्रधानमंत्री भी बना देते
रामलीला मैदान की रैली से पहले मॉक संसद के आयोजन ने भी खूब राजनीतिक चर्चा बटोरी। विपक्ष ने संसद की कार्यवाही का प्रारूप तैयार किया, नेताओं ने अपनी भूमिकाएं निभाईं, भाषण हुए और सत्ता पक्ष को घेरने की कोशिश की गई। यह ठीक है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है और विपक्ष में बैठे राजनीतिक दलों को अपनी बात रखने और सरकार की नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। लेकिन संसद जैसी संस्था की गंभीरता को राजनीतिक प्रदर्शन तक सीमित कर देना कहां तक उचित है? हताशा का आलम यह है कि ये जनता द्वारा चुनी गई सरकार को ‘अवैध’ बता रहे हैं ऐसे में कल को ये सभी मिलकर राहुल गांधी को मॉक संसद में प्रधानमंत्री घोषित कर दें तो ताज्जुब की बात नहीं होगी।
लेकिन, यह बात सभी को याद रखनी होगी लेकिन असली लोकतांत्रिक व्यवस्था में गढ़े हुए ‘नारे’ नहीं, जनता का जनादेश चलता है। और यही वह कसौटी है, जिस पर हर राजनीतिक दल को खरा उतरना पड़ता है। मॉक संसद से रामलीला मैदान तक कांग्रेस का पूरा अभियान आरोपों, नारों और राहुल गांधी के ही इर्द-गिर्द घूमता नजर आया। 10 लाख की भीड़ जुटाने का लक्ष्य, विपक्षी दलों का साझा मंच और दरबारी मीडिया की महारैली वाली सुर्खियां इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस आज भी अपने दम पर जनता के बीच ताकत दिखाने की स्थिति में है? जवाब है नहीं। जब कांग्रेस खुद को राष्ट्रीय राजनीति की सबसे पुरानी और बड़ी राजनीतिक ताकत बताती है, तो उसे अपने शक्ति प्रदर्शन के लिए सहयोगियों की सामूहिक लामबंदी की जरूरत क्यों पड़ती है?
दरअसल, आज कांग्रेस की ख़ुद की हैसियत ऐसी हो गई है कि उसके अपने गठबंधन के अंदर आने वाले क्षेत्रीय दल उन्हें आँखे दिखाते हैं। कांग्रेस यूपी, बिहार या अन्य किसी भी राज्य में जहाँ क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व है वहाँ क़ायदे से अपने लिए सीट नेगोशिएशन भी नहीं कर सकती। कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ा सवाल अपने संगठन, नेतृत्व और राजनीतिक दिशा को लेकर ही है जिसे वह लगातार नज़रअंदाज़ करते हुए चल रही है। गठबंधन के सहयोगियों के साथ मंच साझा करना राजनीतिक रणनीति हो सकती है, लेकिन उससे पार्टी का अपना संगठन मजबूत नहीं हो सकता।
दरबारी मीडिया ने बना दी महारैली, लेकिन मूल सवाल उस जनाधार का है जो नदारद रही
ख़ुद को निष्पक्ष और पत्रकारिता की पैरोकारी करने वाले कुछ पत्रकार और संस्थान राहुल की रैली को लगातार महारैली बता रहे थे। राहुल गांधी की रैली से पहले कुछ दरबारी मीडिया संस्थानों द्वारा जिस तरह का माहौल बनाया गया, उससे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो रामलीला मैदान में कोई ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव होने जा रहा है। किसी ने इसे ‘महारैली’ कहा, तो कहीं राहुल गांधी की आवाज को देश की आवाज बताया गया। लेकिन, रामलीला मैदान में गठबंधन के दलों के कार्यकर्ताओं तो रहे लेकिन आम जनमानस पूरी तरह नदारद दिखा। अलग अलग राज्यों से अलग अलग राजनीतिक दलों से जुड़े कार्यकर्ताओं के आने के बावजूद कांग्रेस की रैली उस नम्बर से कोसों दूर थी जो कांग्रेसी नेताओं के दावों में बताया जा रहा था। यह हालात तब है जब कांग्रेस और उसके सहयोगी दल कई दिन से इस रैली की तैयारियों में जुटे हुए थे।
समाजवादी पार्टी का अपना कैडर है, वामपंथी दलों का अपना संगठन है और तृणमूल कांग्रेस की अपनी राजनीतिक जमीन है। ऐसे में कांग्रेस को यह समझना होगा कि सहयोगियों की ताकत को अपने खाते में जोड़ लेने भर से उसका अपना जनाधार मजबूत नहीं हो जाता। राजनीति में किसी नैरेटिव को सुर्खियों में लाना आसान है, लेकिन जनता के मन में जगह बनाना आसान नहीं। कांग्रेस को यह समझना होगा कि गठबंधन के मंच, मीडिया की सुर्खियां और राजनीतिक नारे अपने आप जनविश्वास नहीं बनाते। अंततः लोकतंत्र में किसी भी दल की ताकत का फैसला जनता अपने अनुभव और मतदान से करती है। जनता ने कांग्रेस के कथित वोट चोरी के नैरेटिव को नकार दिया है। और, सच यही है कि विपक्ष के सत्ता में लौटने के चांसेज जीरो से ज़्यादा नहीं है।
मैं राहुल गांधी को यह सलाह देना चाहता हूँ कि कम से कम इस जन्म में वह प्रधानमंत्री बनने से रहे इसलिए देश को अस्थिर करने के प्रयासों में ख़ुद का समय जाया न करें। उम्र के जिस पड़ाव पर वो हैं उसमें एक साथी, जीवनसंगिनी की जरूरत होती है इसलिए शादी करें और इटली जाकर गृहस्थ का नया अध्याय शुरू करें। देश राष्ट्रवाद के उत्कर्ष पर है और विकसित राष्ट्र होने की दिशा में तेज़ी से दौड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में विकास और जनकल्याण की अवधारणा मजबूत हुई है। मोदी सरकार विकास, बुनियादी सुविधाओं, गरीब कल्याण, डिजिटल व्यवस्था और आर्थिक अवसरों को लेकर अपने काम का हिसाब जनता के सामने रखती रही है जिससे सरकार पर जनता का भरोसा पक्का हुआ है।
एक दो दिन में रामलीला मैदान का शोर थम जाएगा। सुर्खियां बदल जाएंगी और विपक्ष अगले राजनीतिक कार्यक्रम की तैयारी में जुट जाएगा। मगर कांग्रेस के सामने असली चुनौती बनी रहेगी क्या वह गठबंधन की बैसाखी, आरोपों की राजनीति और गांधी परिवार के इर्द-गिर्द घूमते नेतृत्व से आगे निकलकर अपने दम पर जनता का विश्वास जीत पाएगी? क्योंकि लोकतंत्र में मंच सजाने से जनाधार नहीं बनता, नारे लगाने से विकल्प तैयार नहीं होता और राजनीतिक शोर से जनादेश हासिल नहीं किया जा सकता। जनादेश के लिए जनता के बीच जाना पड़ता है, काम करना पड़ता है और अपने वादों का हिसाब देना पड़ता है।



