द लोकतंत्र/नई दिल्ली: Google Gmail Case में दिल्ली हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी निजी कंपनी की ईमेल सेवा का व्यापक इस्तेमाल होना या यूजर्स का अपने काम के लिए उस पर निर्भर होना, उसे सार्वजनिक कार्य(Public Function) नहीं बनाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी निजी संस्था के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं, यह उसकी सेवाओं की लोकप्रियता के बजाय उसके कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है। न्यायमूर्ति अमित महाजन ने यह टिप्पणी एक मीडिया कंपनी की उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें बंद किए गए Gmail अकाउंट की पहुंच बहाल करने की मांग की गई थी।
Gmail अकाउंट बंद होने पर कोर्ट पहुंची मीडिया कंपनी
यह मामला जंता लाइव प्रेस नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड(Janta Live Press Network Pvt Ltd) और उसके निदेशक की याचिका से जुड़ा है। कंपनी Janta Live News नाम से मीडिया कारोबार चलाती है और उसका एक YouTube न्यूज चैनल भी है। याचिकाकर्ताओं ने Google LLC और Google India Pvt Ltd के खिलाफ अदालत का रुख किया था।
याचिका के अनुसार, 20 जुलाई 2026 को उनके Gmail अकाउंट तक कुछ अनधिकृत लोगों ने पहुंच बना ली थी। इसके बाद Google ने असामान्य गतिविधि(Unusual Activity) का हवाला देते हुए अकाउंट को बंद कर दिया। कंपनी के निदेशक ने अपने निजी ईमेल अकाउंट के जरिए Google Support से संपर्क कर स्थिति समझाने और अकाउंट दोबारा चालू करने का अनुरोध किया। हालांकि, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।
साइबर पुलिस में शिकायत के बाद भी नहीं मिला एक्सेस
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, Google से संपर्क करने के प्रयासों के बावजूद अकाउंट की पहुंच बहाल नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने साइबर पुलिस स्टेशन में भी शिकायत दर्ज कराई। इसके बावजूद समस्या का समाधान नहीं होने पर उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
कंपनी ने अदालत से अपने मूल अकाउंट रिकवरी विवरण(Recovery Credentials) का सत्यापन कराने और Gmail अकाउंट का पूरा एक्सेस बहाल करने का निर्देश देने की मांग की। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि Google की सेवाओं का व्यापक इस्तेमाल होता है और कंपनी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) तथा सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत कुछ जिम्मेदारियां निभाती है। इसलिए उसके खिलाफ रिट याचिका दायर की जा सकती है।
अदालत ने बताया, क्या होता है Public Function
न्यायमूर्ति अमित महाजन ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट निजी संस्थाओं के खिलाफ भी रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर सकता है, लेकिन इसके लिए यह देखना जरूरी है कि संबंधित संस्था कोई सार्वजनिक कार्य या सरकारी जिम्मेदारी से जुड़ा कार्य कर रही है या नहीं।
अदालत के अनुसार, ईमेल, होस्टिंग और अन्य डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराना निजी कंपनियों की व्यावसायिक गतिविधि है। केवल किसी सेवा का लोकप्रिय होना या किसी कंपनी का बड़ा उपयोगकर्ता आधार होना उसे सार्वजनिक कार्य करने वाली संस्था नहीं बनाता। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि ईमेल सेवाएं कई स्वतंत्र कंपनियां उपलब्ध कराती हैं और इस क्षेत्र में Google का एकाधिकार नहीं है।
IT Act और 2021 के नियमों पर भी अदालत की टिप्पणी
याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और वर्ष 2021 के मध्यस्थ दिशानिर्देशों का भी हवाला दिया था। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि शिकायतों के निपटारे और मध्यस्थों से संबंधित कानूनी नियमों के तहत कुछ जिम्मेदारियां होने का मतलब यह नहीं है कि अकाउंट बंद करने, सुरक्षा संबंधी घटनाओं या ग्राहक सहायता से जुड़ी हर शिकायत को सार्वजनिक कार्य का मामला मान लिया जाए।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत एक पुराने फैसले को भी अलग माना। उस मामले में ऑनलाइन न्यायिक रिकॉर्ड से जुड़ी व्यक्तिगत जानकारी हटाने और नाम के आधार पर खोजे जा सकने वाले रिकॉर्ड को सीमित करने का मुद्दा था, जबकि मौजूदा मामला Gmail अकाउंट की पहुंच बहाल कराने से संबंधित था।
हाई कोर्ट ने माना कि कंपनी की शिकायत उसके लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन मुख्य सवाल यह था कि क्या इस मामले में रिट याचिका उचित कानूनी उपाय है। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि Google इस मामले में कानूनी अर्थों में कोई सार्वजनिक कार्य कर रहा था। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई। हालांकि, याचिकाकर्ताओं को कानून के तहत उपलब्ध अन्य उचित कानूनी उपाय अपनाने की छूट दी गई।
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