द लोकतंत्र/ लखनऊ : उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। योगी आदित्यनाथ के सख्त रुख के बाद पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन ने भले ही इस व्यवस्था को समाप्त करने का निर्णय लिया हो, लेकिन नियामकीय स्तर पर मामले की गंभीरता बनी हुई है। उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने पावर कॉरपोरेशन से जवाब न मिलने पर कड़ा रुख अपनाते हुए अब 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण देने का निर्देश जारी किया है।
आयोग ने पहले 16 अप्रैल को कॉरपोरेशन प्रबंधन से 10 दिनों के भीतर जवाब मांगा था, जिसकी अंतिम तारीख 26 अप्रैल थी। हालांकि तय समयसीमा के बाद भी जवाब दाखिल नहीं किया गया। यहां तक कि 20 दिन बीत जाने के बाद भी जब कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो आयोग ने इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक को तत्काल जवाब देने का आदेश दिया है।
आयोग की सख्ती: दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी
नियामक आयोग ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित 24 घंटे के भीतर जवाब नहीं दिया गया, तो पावर कॉरपोरेशन के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। यह कदम इस बात का संकेत है कि आयोग स्मार्ट प्रीपेड मीटर से जुड़े विवाद को लेकर बेहद गंभीर है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों और नियामकीय नियमों के उल्लंघन से भी जुड़ा है। आयोग ने संकेत दिए हैं कि नियमों की अनदेखी करने पर सख्त कदम उठाए जा सकते हैं, जिससे भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो।
उपभोक्ता परिषद के आरोप: नियमों के उल्लंघन का मामला
इस पूरे विवाद की शुरुआत उपभोक्ता परिषद द्वारा दायर याचिका से हुई थी। परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने आरोप लगाया है कि पावर कॉरपोरेशन ने Electricity Act 2003 की धारा 47(5) और केंद्रीय दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया है।
उनका कहना है कि नए बिजली कनेक्शन केवल प्रीपेड मोड में दिए जा रहे थे और मौजूदा पोस्टपेड कनेक्शनों को उपभोक्ताओं की सहमति के बिना प्रीपेड में बदला गया, जो नियमों के खिलाफ है। परिषद ने यह भी मांग की है कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता समाप्त करने के लिए स्पष्ट कार्यालय आदेश जारी किया जाए।
वर्मा ने आयोग से यह भी आग्रह किया है कि पावर कॉरपोरेशन के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा हो सके। स्मार्ट प्रीपेड मीटर विवाद अब एक बड़े नियामकीय मुद्दे के रूप में उभर चुका है, जहां सरकार, आयोग और उपभोक्ता संगठनों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। आने वाले समय में आयोग की कार्रवाई इस मामले की दिशा तय करेगी।

