द लोकतंत्र/ सुदीप्त मणि त्रिपाठी : Independence Day 2026 बीत गया। एक दिन के लिए सोशल मीडिया देशभक्ति के रंग में रंग गया। हर तरफ तिरंगा था, राष्ट्रगान था, स्वतंत्रता सेनानियों को नमन था और देश के लिए भावुक संदेश थे। लेकिन स्वतंत्रता दिवस के अगले दिन एक सवाल और ज्यादा जरूरी हो जाता है कि क्या देशभक्ति हमारे लिए महज सिर्फ एक दिन की सोशल मीडिया गतिविधि है या हमारे रोजमर्रा के आचरण का हिस्सा भी? क्या तिरंगा हमारी प्रोफाइल पर जितना दिखाई देता है, उतना ही हमारे चरित्र में भी नज़र आता है ?
Independence Day 2026: क्या देश की हर समस्या के लिए सिर्फ सरकार जिम्मेदार है?
हम अक्सर देश की समस्याओं के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। और यह सही भी है कि सरकार की आलोचना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है और सरकार से जवाब मांगना हर नागरिक का कर्तव्य भी। लेकिन क्या देश की हर समस्या के पीछे सिर्फ सरकार ही एकमात्र कारण है? इसका जवाब ढुढ़ने से पहले हमें एक सवाल ख़ुद से और करना चाहिए क्या व्यवस्था में मौजूद हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभा रहा है? और उससे भी बड़ा सवाल- क्या हम नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं?
आज देश में समस्याओं की कोई कमी नहीं है। अस्पतालों में अव्यवस्था है, सरकारी स्कूलों में चुनौतियां हैं, शहरों में गंदगी है, सड़कों पर यातायात की समस्या है, सरकारी कार्यालयों में लापरवाही है, भ्रष्टाचार है और सार्वजनिक सेवाओं में कमी है। हर समस्या के लिए ऊपर की ओर देखने की हमारी आदत हो गई है। लेकिन क्या कभी हमने नीचे की ओर देखने की कोशिश की है कि इसमें हमारी अपनी भूमिका क्या है?
किसी देश की व्यवस्था केवल कानूनों, मंत्रालयों और सरकारी भवनों से नहीं बनती। व्यवस्था उन लाखों लोगों से बनती है जो रोज किसी न किसी जिम्मेदारी वाली कुर्सी पर बैठे हैं। एक अस्पताल का सीएमओ, एक जिले का डीएम, एक थाने का प्रभारी, एक विद्यालय का शिक्षक, एक ग्राम प्रधान, एक सरकारी कर्मचारी और अंततः वह आम नागरिक, जो इस पूरी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। कल्पना कीजिए कि किसी सरकारी अस्पताल का सीएमओ अपने पद को सिर्फ नौकरी नहीं, जिम्मेदारी समझकर निभाए। डॉक्टर समय पर आएं, दवाएं उपलब्ध हों, मरीजों के साथ सम्मानजनक व्यवहार हो, संसाधनों का दुरुपयोग न हो, शिकायतों पर कार्रवाई हो और अस्पताल की हर व्यवस्था की नियमित निगरानी हो। क्या उस अस्पताल की तस्वीर नहीं बदली जा सकती? बिल्कुल बदल सकती है।
यह भी कल्पना कीजिए कि किसी जिले में जिलाधिकारी अपने प्रशासनिक अधिकार को सिर्फ सरकारी पद की शक्ति न मानकर जनसेवा का दायित्व समझे, अधीनस्थ अधिकारियों की जवाबदेही तय करे, योजनाओं की जमीन पर निगरानी करे और नागरिकों की समस्याओं को प्राथमिकता दे तो क्या पूरे जिले की प्रशासनिक संस्कृति नहीं बदल सकती? बदल सकती है। अब यह भी सोचिए कि किसी गांव में ग्राम प्रधान अपने पद को सिर्फ चुनाव जीतने का परिणाम नहीं बल्कि गांव के प्रति सार्वजनिक जिम्मेदारी माने, पंचायत सचिव ईमानदारी से काम करे, सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्ति तक पहुंचे और ग्रामीण भी सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति समझें तो क्या गांव नहीं बदल सकता? बदल सकता है। फिर अड़चन आखिर है कहां? शायद व्यवस्था में उतनी नहीं, हमारे चरित्र में उससे कहीं ज्यादा।
भ्रष्टाचार सिर्फ सिस्टम की समस्या नहीं, हमारी मानसिकता का भी आईना है
हम भ्रष्टाचार से परेशान हैं। हम रिश्वत से परेशान हैं। हम सरकारी कार्यालयों में काम के लिए भटकने से परेशान हैं। हम व्यवस्था की खामियों पर नाराज हैं। लेकिन क्या हमने कभी ईमानदारी से यह पूछा कि भ्रष्टाचार को बनाए रखने में कहीं हमारा अपना योगदान तो नहीं? यहां एक बेहद असहज सच सामने आता है। हम निजी तौर पर भ्रष्टाचार से कोफ्त करते हैं, लेकिन जब लाभ हमारे हिस्से में आने लगे तो हमारा नैतिक आक्रोश कई बार कमजोर पड़ जाता है।
हमें रिश्वत लेना बुरा लगता है, लेकिन किसी परिचित के जरिए अपना काम जल्दी निकलवाने में उतनी परेशानी नहीं होती। सरकारी भ्रष्टाचार से नाराजगी होती है, लेकिन अपनी सुविधा के लिए नियमों को मोड़ने में हम कई बार संकोच नहीं करते। हम चाहते हैं कि दूसरा ईमानदार रहे, लेकिन जब बात अपने लाभ की आती है तो नैतिकता के लिए अलग-अलग मापदंड तैयार हो जाते हैं। और सबसे विचित्र स्थिति तब पैदा होती है, जब हम भ्रष्टाचार को गाली देते हुए भी ‘ऊपरी कमाई’ की संभावना को सामाजिक सफलता का हिस्सा मानने लगते हैं।
एक किस्सा बताता हूँ दरअसल, पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान मैं बिहार में था। चुनावी माहौल में कई परिवारों और युवाओं से बातचीत का अवसर मिला। उनमें एक बात बार-बार सामने आई कि बिहार के युवाओं के सामने विकल्प बहुत सीमित होते हैं। कई युवाओं का यह मानना है कि या तो वे सरकारी नौकरी हासिल करें या फिर अपने राज्य से दूर जाकर मजदूरी अथवा नौकरी करें।
कई परिवारों में सरकारी नौकरी को लेकर जुनून साफ दिखाई देता था। कोई कलेक्टर बनने की तैयारी कर रहा था, कोई सिपाही बनने की, कोई हवलदार बनने की, और कोई सरकारी टीचर बनने की। संघर्ष, तैयारी और स्थिर भविष्य की इच्छा अपनी जगह बिल्कुल जायज है। लेकिन एक बात ऐसी है जो समाज के भीतर घुस चुकी भ्रष्टाचारी सोच को सामने रखती है। अधिकांश परिवारों का मानना है कि अगर लड़के को सरकारी नौकरी मिल जाएगी तो एक पीढ़ी सुधर जाएगी। पहली नजर में यह वाक्य बेहद सामान्य लगता है। आखिर कौन माता-पिता नहीं चाहते कि उनके बेटे या बेटी की नौकरी लग जाए और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरे?
लेकिन इस वाक्य के पीछे छिपे अश्लील सच और नंगेपन भरे अर्थ को समझिए। बात सिर्फ वेतन की नहीं थी। ‘एक पीढ़ी सुधर जाएगी’ के भीतर नौकरी की स्थिरता के साथ उन तमाम सुविधाओं और संभावनाओं की कल्पना भी थी, जिन्हें समाज अक्सर खुले शब्दों में नहीं कहता। ऊपरी कमाई जैसे शब्द सभ्य बातचीत में शायद ही इस्तेमाल किए जाते हैं। कौन भला ख़ुद को कहेगा कि वह भ्रष्टाचार का सपोर्टर है? उसकी जगह बेहद शातिराना तरीके से शब्दों को चाशनी में डुबाकर कहा जाता है ‘घर की हालत सुधर जाएगी’, ‘सुख-सुविधा हो जाएगी’, ‘बच्चों का भविष्य बन जाएगा’, ‘एक पीढ़ी निकल जाएगी।’
लेकिन हमें यह सवाल पूछना होगा कि आखिर उस अतिरिक्त समृद्धि का स्रोत क्या है? अगर किसी सरकारी पद को इसलिए प्रतिष्ठित माना जा रहा है कि वहां वेतन से अधिक कमाने की गुंजाइश है, तो समस्या सिर्फ भ्रष्ट अधिकारी की नहीं है। समस्या उस सामाजिक मानसिकता की भी है जिसने भ्रष्ट कमाई को सफलता का एक स्वीकार्य रास्ता बना दिया है। हालांकि यहाँ यह कहना भी गलत होगा कि हर सरकारी नौकरी चाहने वाला व्यक्ति भ्रष्टाचार के इरादे से नौकरी चाहता है। ऐसा कहना लाखों ईमानदार युवाओं और उनके संघर्ष का अपमान होगा। सरकारी नौकरी की चाह के पीछे स्थिरता, सम्मान, सामाजिक सुरक्षा, बेहतर जीवन और परिवार के भविष्य की चिंता जैसे वास्तविक कारण भी हैं।
लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि हम उस मानसिकता पर बात करें जहां कुछ परिवारों और सामाजिक समूहों में ‘सरकारी नौकरी’ के साथ ‘ऊपरी कमाई’ की एक अनकही कल्पना जुड़ जाती है। यही वह जगह है जहां हमें अपने समाज के आईने में खुद को देखना चाहिए। हम भ्रष्ट अधिकारी को गाली देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। लेकिन भ्रष्टाचार को सामाजिक स्वीकृति कौन देता है? जिसे देखकर लोग कहते हैं- बहुत पैसा बना लिया। जिसके घर की चमक-दमक देखकर लोग उसकी सफलता की चर्चा करते हैं, उसके भ्रष्टाचार की नहीं। जिस अधिकारी की संपत्ति उसकी आय से मेल नहीं खाती, लेकिन समाज उसके रहन-सहन को देखकर प्रभावित होता है। जिस व्यक्ति के बारे में सब जानते हैं कि उसने गलत तरीके से पैसा बनाया है, फिर भी उसके सामाजिक सम्मान में कोई कमी नहीं आती। वहां भ्रष्टाचार सिर्फ कार्यालय में नहीं, समाज की चेतना में भी मौजूद है।
हम भ्रष्टाचार खत्म करना चाहते हैं, लेकिन भ्रष्ट तरीके से अमीर हुए व्यक्ति को असफल नहीं मानते हैं। हम ईमानदार आदमी की कठिन जिंदगी पर सहानुभूति जताते हैं, लेकिन बेईमानी से बनी समृद्धि को कई बार उपलब्धि की तरह देखते हैं। फिर बदलाव कैसे आएगा?
सिविक सेंस और नागरिक जिम्मेदारी से बदलेगा देश
सरकारें बदलती हैं। मुख्यमंत्री बदलते हैं। मंत्री बदलते हैं। अधिकारी बदलते हैं। नीतियाँ बदलती हैं। लेकिन अगर जिम्मेदारी निभाने की संस्कृति नहीं बदलती, तो व्यवस्था की बुनियादी समस्या जस की तस रह सकती है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि सरकार क्या कर रही है?
सवाल यह भी होना चाहिए कि मैं क्या कर रहा हूँ? एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों के प्रति कितना ईमानदार है? एक डॉक्टर अपने मरीज के प्रति कितना जिम्मेदार है? एक पुलिसकर्मी कानून के प्रति कितना निष्पक्ष है? एक अधिकारी अपने पद के प्रति कितना जवाबदेह है? एक व्यापारी अपने ग्राहक के प्रति कितना ईमानदार है? एक पत्रकार अपने शब्दों और तथ्यों के प्रति कितना जिम्मेदार है? एक जनप्रतिनिधि अपने मतदाताओं के प्रति कितना जवाबदेह है? और एक नागरिक अपने देश और अपने सह-नागरिकों के प्रति कितना संवेदनशील है? यही सवाल किसी भी लोकतंत्र की असली बुनियाद हैं।
हम सड़क पर कूड़ा फेंकते हैं और शहर को गंदा कहते हैं। ट्रैफिक नियम तोड़ते हैं और व्यवस्था को दोष देते हैं। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं और सरकार से बेहतर सुविधाओं की मांग करते हैं। कतार में पीछे खड़े लोगों को धक्का देकर आगे निकलते हैं और व्यवस्था की अनुशासनहीनता पर भाषण देते हैं। हमारे लिए ‘सिविक सेंस’ अक्सर एक अंग्रेजी शब्द भर है। असल में यह नागरिक चरित्र है। यह समझ कि सड़क पर मेरे अलावा भी कोई है। अस्पताल में मेरे अलावा भी मरीज हैं। सरकारी कार्यालय में मेरे अलावा भी नागरिक हैं। पार्क सिर्फ मेरे बच्चों के लिए नहीं है। सार्वजनिक संपत्ति किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक संपत्ति है।
एक सभ्य देश का निर्माण बड़े-बड़े भाषणों से नहीं, छोटे-छोटे नागरिक व्यवहारों से होता है। शायद बहुत कुछ नहीं। एक अस्पताल में हर व्यक्ति अपना काम ईमानदारी से कर दे। जिला प्रशासन अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभा दे। एक ग्राम प्रधान अपने गांव के प्रति जवाबदेह हो जाए। एक शिक्षक अपनी कक्षा को सिर्फ नौकरी का हिस्सा नहीं, भविष्य निर्माण का अवसर समझे। एक पुलिसकर्मी कानून को व्यक्ति देखकर नहीं, संविधान देखकर लागू करे। एक सरकारी कर्मचारी बिना रिश्वत के अपना काम कर दे। एक व्यापारी मिलावट से इनकार कर दे। एक पत्रकार अपने पेशे की विश्वसनीयता से समझौता न करे। एक जनप्रतिनिधि जनता को चुनाव के बाद भी याद रखे। और एक आम नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी उतनी ही गंभीरता से स्वीकार कर ले।
क्या इससे देश नहीं बदल सकता? क्यों नहीं बदल सकता?vऊपर से नीचे तक हर व्यक्ति को आखिर अपनी जिम्मेदारी का हिस्सा ही तो निभाना है और साथ में जवाबदेह होना है ।
तिरंगा सिर्फ प्रोफाइल पर नहीं, चरित्र में भी दिखना चाहिए
देशभक्ति सिर्फ सीमा पर तैनात सैनिक को सलाम करना नहीं है। वह सफाईकर्मी के श्रम का सम्मान करना भी है। वह सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए खड़े गरीब मरीज के अधिकार का सम्मान करना भी है। वह सरकारी स्कूल में पढ़ रहे बच्चे के भविष्य को गंभीरता से लेना भी है। वह अपने से अलग विचार रखने वाले नागरिक के अधिकार का सम्मान करना भी है। और सबसे बढ़कर, देशभक्ति उस समय दिखाई देती है जब कोई हमें देख नहीं रहा होता और तब भी हम अपना काम ईमानदारी से करते हैं। तिरंगा हाथ में लेकर देशभक्ति व्यक्त करना आसान है। तिरंगे के मूल्यों को अपने व्यवहार में उतारना कठिन है। क्योंकि वहां कैमरा नहीं होता। सोशल मीडिया नहीं होता। लाइक और कमेंट नहीं होते। वहां सिर्फ हमारा चरित्र होता।
सरकार से सवाल कीजिए। सत्ता से सवाल कीजिए। प्रशासन से सवाल कीजिए। व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठाइए। लेकिन उसी साहस से खुद से भी सवाल कीजिए। क्या मैं अपना काम ईमानदारी से करता हूँ? क्या मैं नियमों का पालन करता हूं? क्या मैं सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति समझता हूँ? क्या मेरे व्यवहार से किसी दूसरे नागरिक का जीवन आसान होता है या मुश्किल? क्या मैं भ्रष्टाचार का विरोध सिर्फ तब करता हूं जब उसका नुकसान मुझे होता है? क्या मैं ईमानदारी को सचमुच सम्मान देता हूं या सिर्फ उसके बारे में बातें करता हूं?
और सबसे कठिन सवाल- अगर मेरे पास गलत तरीके से पैसा कमाने का अवसर आए तो क्या मैं उसे ठुकरा दूंगा? यहीं से असली नागरिक परीक्षा शुरू होती है। क्योंकि भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए सिर्फ भ्रष्ट व्यक्ति को पकड़ना पर्याप्त नहीं है। हमें उस सामाजिक मानसिकता को भी बदलना होगा जो बेईमानी से अर्जित समृद्धि को सफलता की तरह देखती है। देश को बदलने के लिए हर नागरिक को प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या जिलाधिकारी बनने की जरूरत नहीं है। उसे सिर्फ अपने हिस्से का भारत ईमानदारी से संभालना है।
एक सीएमओ अपना अस्पताल संभाल ले। एक डीएम अपना जिला संभाल ले। एक ग्राम प्रधान अपना गांव संभाल ले। एक शिक्षक अपनी कक्षा संभाल ले। एक कर्मचारी अपनी मेज संभाल ले। एक पुलिसकर्मी अपना कानून संभाल ले। एक पत्रकार अपनी कलम संभाल ले। एक व्यापारी अपनी नीयत संभाल ले। और एक नागरिक अपना आचरण संभाल ले। फिर इस देश को बदलने से हमें कौन रोक सकता है?
अड़चन आखिर है कहां? शायद सरकार में नहीं। शायद सिस्टम में भी पूरी तरह नहीं। शायद सबसे बड़ी अड़चन हमारे भीतर है। इसलिए स्वतंत्रता दिवस के बाद सबसे जरूरी काम अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल से तिरंगा हटाना नहीं, बल्कि अपने भीतर उस तिरंगे के अर्थ को बचाए रखना है। क्योंकि देश साल में एक दिन तिरंगा लगाने से महान नहीं बनता। देश तब महान बनता है, जब उसके नागरिक हर दिन अपने कर्म से तिरंगे का सम्मान करते हैं। और शायद सच्ची देशभक्ति की सबसे सटीक परिभाषा यही है – अपने देश से प्रेम कीजिए, अपने सह-नागरिक का सम्मान कीजिए और जिस जिम्मेदारी की जगह पर हैं, उसे पूरी ईमानदारी से निभाइए। बाकी बदलाव अपने आप रास्ता खोज लेगा। जय हिन्द।



