द लोकतंत्र/ नई दिल्ली : देश में प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation Bill 2026) विधेयक को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। माना जा रहा है कि केंद्र सरकार आगामी मानसून सत्र के दौरान इस विधेयक को आगे बढ़ाने की तैयारी कर सकती है। इसी बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) की कार्यकारी अध्यक्ष और लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले के बयान ने इस मुद्दे को नई दिशा दे दी है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि यदि विधेयक में कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं का ध्यान रखा जाता है, तो उनकी पार्टी इस पर सकारात्मक विचार कर सकती है।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अभी तक उनकी पार्टी के पास विधेयक का अंतिम मसौदा नहीं पहुंचा है। ऐसे में किसी भी प्रकार का समर्थन या विरोध दर्ज कराने से पहले पार्टी विधेयक का विस्तृत अध्ययन करेगी। उन्होंने कहा कि अंतिम निर्णय विधेयक की वास्तविक सामग्री और उसके प्रभाव का मूल्यांकन करने के बाद ही लिया जाएगा। सुप्रिया सुले ने कहा कि यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो इसका सबसे अधिक असर दक्षिण भारत के राज्यों पर पड़ेगा। उनके अनुसार, ऐसे राज्यों के साथ किसी भी प्रकार का असंतुलन या अन्याय नहीं होना चाहिए।
Delimitation Bill 2026: लोकसभा सीटों में 50% वृद्धि के प्रस्ताव पर सकारात्मक संकेत
मीडिया से बातचीत के दौरान सुप्रिया सुले ने कहा कि यदि नए परिसीमन में सभी राज्यों की मौजूदा लोकसभा सीटों में लगभग 50 प्रतिशत की समान वृद्धि का प्रावधान किया जाता है, तो उस पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर उनकी पार्टी INDIA गठबंधन के अन्य सहयोगी दलों से भी चर्चा करेगी और सामूहिक निर्णय लिया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई एक सर्वदलीय बैठक में इस विकल्प पर चर्चा की गई थी। उनके अनुसार, इस प्रस्ताव पर केवल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ही नहीं, बल्कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने भी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी।
हालांकि, उन्होंने दोहराया कि अंतिम समर्थन विधेयक के आधिकारिक मसौदे को देखने के बाद ही तय किया जाएगा। उनका कहना था कि किसी भी राजनीतिक दल को बिना विधेयक पढ़े अपना अंतिम रुख नहीं अपनाना चाहिए।
सरकार का दावा- Delimitation Bill 2026 के अंतर्गत दक्षिण भारत के साथ नहीं होगा अन्याय, विपक्ष अभी भी सतर्क
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इस वर्ष अप्रैल में संसद के विशेष सत्र के दौरान परिसीमन विधेयक, 2026, संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 तथा केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 संसद में पेश किए थे। उस दौरान लोकसभा में चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया था कि परिसीमन प्रक्रिया में किसी भी राज्य, विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों के साथ कोई अन्याय नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा था कि वर्तमान में दक्षिण भारत से लोकसभा के 129 सांसद हैं और प्रस्तावित व्यवस्था के बाद उनकी संख्या बढ़कर 195 तक पहुंच सकती है।
अमित शाह ने यह भी कहा था कि सरकार ने परिसीमन आयोग से संबंधित मौजूदा कानूनी ढांचे में कोई मूलभूत बदलाव नहीं किया है। उनके अनुसार, नई व्यवस्था का उद्देश्य प्रतिनिधित्व को संतुलित और प्रभावी बनाना है, न कि किसी क्षेत्र को नुकसान पहुंचाना। दूसरी ओर, विपक्षी INDIA गठबंधन पहले इस विधेयक पर कई सवाल उठा चुका है। विपक्ष का आरोप रहा है कि परिसीमन की प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा सकता है और इससे विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व के संतुलन पर असर पड़ सकता है।
अब जबकि मानसून सत्र नजदीक है और विपक्ष के कुछ दलों की ओर से शर्तों के साथ सकारात्मक संकेत भी सामने आ रहे हैं, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार विधेयक का अंतिम स्वरूप क्या रखती है और संसद में इसे कितना व्यापक समर्थन मिल पाता है। परिसीमन विधेयक आने वाले समय में देश की संसदीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनने की संभावना रखता है।




