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BHU में मोती बीए की 107वीं जयंती पर संगोष्ठी, Manoj Bhawuk बोले- हिंदी सिनेमा में भोजपुरी को पहचान दिलाने वाले थे मोती बीए

Seminar at BHU on the 107th birth anniversary of Moti BA; Manoj Bhawuk says Moti BA was the one who brought recognition to Bhojpuri in Hindi cinema.

द लोकतंत्र/ वाराणसी : वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के भोजपुरी अध्ययन केंद्र में महान साहित्यकार, लोकप्रिय गीतकार और भोजपुरी भाषा के पुरोधा मोती बीए की 107वीं जयंती के अवसर पर एक भव्य स्मृति-संगोष्ठी का आयोजन किया गया। शोध संवाद समूह की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में देश के कई प्रतिष्ठित साहित्यकारों, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने मोती बीए के साहित्य, फिल्मी गीतों और भोजपुरी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में उनके ऐतिहासिक योगदान को याद किया।

राहुल सभागार में आयोजित इस संगोष्ठी का आयोजन भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक एवं कार्यक्रम संयोजक प्रो. प्रभाकर सिंह के मार्गदर्शन में किया गया, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्रीप्रकाश शुक्ल ने की। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि मोती बीए केवल एक साहित्यकार नहीं थे, बल्कि भोजपुरी भाषा और संस्कृति को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने वाले युगद्रष्टा रचनाकार थे।

‘नदिया के पार’ से हिंदी सिनेमा में भोजपुरी को मिली नई पहचान: Manoj Bhawuk

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता एवं वरिष्ठ साहित्यकार मनोज भावुक ने कहा कि हिंदी सिनेमा में भोजपुरी भाषा को सम्मानजनक स्थान दिलाने का सबसे बड़ा श्रेय मोती बीए को जाता है। उन्होंने बताया कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक (बीए) की पढ़ाई पूरी करने के बाद ‘बीए’ उनके नाम का स्थायी हिस्सा बन गया और आगे चलकर यही उनकी साहित्यिक पहचान बन गई।

मनोज भावुक ने कहा कि वर्ष 1948 में रिलीज हुई फिल्म ‘नदिया के पार’ के सभी भोजपुरी गीत मोती बीए ने लिखे थे। दिलीप कुमार और कामिनी कौशल अभिनीत इस फिल्म के गीतों ने पूरे देश में भोजपुरी भाषा को नई पहचान दिलाई और यह साबित किया कि भोजपुरी केवल लोकभाषा ही नहीं, बल्कि समृद्ध साहित्यिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की भाषा भी है। उन्होंने बताया कि मोती बीए ने अपने लंबे रचनात्मक जीवन में लगभग 80 फिल्मों के लिए गीत लिखे और करीब 40 पुस्तकों की रचना की। इसके अलावा उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य, बहुभाषी लेखन और सांस्कृतिक चेतना से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए, जिनका प्रभाव आज भी साहित्य और सिनेमा दोनों क्षेत्रों में देखा जा सकता है।

भोजपुरी साहित्य और संस्कृति के अमर हस्ताक्षर थे मोती बीए

कार्यक्रम के दूसरे वक्ता विवेक निराला ने मोती बीए की प्रमुख साहित्यिक कृतियों भोजपुरी सानेट, सेमर के फूल, तुलसी रसायन तथा मेघदूत के भोजपुरी काव्यानुवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका साहित्य भोजपुरी समाज, लोकजीवन और सांस्कृतिक मूल्यों का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि मोती बीए की रचनाएं आज भी नई पीढ़ी को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने का कार्य कर रही हैं।

वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यनारायण सिंह ने मोती बीए से जुड़े आत्मीय संस्मरण साझा करते हुए उनके सरल व्यक्तित्व और साहित्य के प्रति समर्पण को याद किया। वहीं अध्यक्षीय उद्बोधन में श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि मोती बीए ने अनेक भाषाओं में लेखन किया, लेकिन उनकी आत्मा हमेशा भोजपुरी में बसती रही। उन्होंने भोजपुरी भाषा को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

कार्यक्रम के अंत में भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. प्रभाकर सिंह ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों और विद्यार्थियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मोती बीए जैसे महान साहित्यकारों की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भोजपुरी अध्ययन केंद्र का प्रमुख उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि ऐसी संगोष्ठियां न केवल साहित्यिक विरासत को संरक्षित करती हैं, बल्कि युवा पीढ़ी को अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति जागरूक भी बनाती हैं। इस अवसर पर प्रो. आशीष त्रिपाठी, प्रो. नीरज खरे, प्रो. देवेंद्र, विंध्याचल यादव, हरीश कुमार, अनीता सिंह सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे। सभी ने महान साहित्यकार मोती बीए को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके योगदान को सदैव स्मरणीय बताया।

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Team The Loktantra

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