द लोकतंत्र/ वैभव भारद्वाज : अध्यात्म का रहस्य स्वयं को जानना (आत्म-ज्ञान) और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना है, जो जीवन के कष्टों से मुक्ति दिलाकर जीवन को सुख-शांति की ओर ले जाता है। यह धर्म से परे, आत्मा और परमात्मा (ईश्वर) के अंतर्संबंध को समझने की प्रक्रिया है। अध्यात्म को किसी एक धर्म के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। इसको सभी धर्म के अनुयायी अपना सकते हैं। इसका मुख्य रहस्य सांसारिक मोह को छोड़कर, भीतरी विकारों (ईर्ष्या, लोभ, मोह, अहंकार) को समाप्त करना है। अध्यात्म (Adhyatma) का अर्थ है ‘आत्मा से संबंधित’ या ‘स्वयं के भीतर की यात्रा’ (अधि + आत्मन)। अध्यात्म केवल बाहरी पूजा-पाठ या कर्मकांड नहीं, बल्कि अपनी अमर आत्मा को पहचानने, मन को नियंत्रित करने और जीवन के परम सत्य (परमात्मा) से जुड़ने की एक आंतरिक प्रक्रिया है। यह अहंकार को मिटाकर आत्म-ज्ञान प्राप्त करने का मार्ग है।
अध्यात्म के प्रमुख रहस्य
अध्यात्म का शाब्दिक अर्थ ही आत्मा से जुड़ना है। संस्कृत में ‘अधि’ का अर्थ है ‘संबंधित’ या ‘ऊपर’ तथा ‘आत्मन्’ का अर्थ है ‘स्वयं’ या ‘आत्मा’। इसलिए अध्यात्म का पहला रहस्य यही है कि मनुष्य स्वयं से यह प्रश्न करे – मैं कौन हूँ? क्या मैं केवल शरीर हूँ या आत्मा? मैं कहाँ से आया हूँ और मेरा जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने की प्रक्रिया ही अध्यात्म है, न कि केवल बाहरी आडंबरों, कर्मकांडों और दिखावे में उलझ जाना।
अध्यात्म हमें संसार की चकाचौंध से हटाकर अपने भीतर की यात्रा करने का मार्ग दिखाता है। यह यात्रा मौन, ध्यान (Meditation) और आत्मचिंतन के माध्यम से पूरी होती है। जब मनुष्य अपने भीतर उतरता है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगता है। इसी प्रक्रिया में वह अपने भीतर छिपे ईर्ष्या, लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार जैसे विकारों को भी पहचानता है और उनसे मुक्त होने का प्रयास करता है। यही वास्तविक आध्यात्मिकता है।
अध्यात्म केवल जानकारी या ज्ञान एकत्र करने का माध्यम नहीं है, बल्कि सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव करने का मार्ग है। यह मनुष्य को चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुंचने की प्रेरणा देता है। साथ ही यह सिखाता है कि फल की इच्छा के बिना किए गए कर्म, निस्वार्थ सेवा, समर्पण और प्रार्थना के माध्यम से भी ईश्वर के निकट पहुँचा जा सकता है। महर्षि दधीचि का त्याग और माता शबरी की निष्काम भक्ति अध्यात्म की इसी मूल भावना के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। अध्यात्म का एक और महत्वपूर्ण रहस्य यह है कि मनुष्य उस सत्य की खोज करे जिसे मृत्यु भी समाप्त नहीं कर सकती। शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर और शाश्वत है। गीता के अनुसार आत्मा के स्वरूप को जानना तथा योग और साधना के माध्यम से मन की शुद्धि करना ही अध्यात्म का वास्तविक सार है।
गीता का संदेश और आध्यात्मिक जीवन
गीता के अध्याय 2 के श्लोक 56 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं –
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।। (2.56)
अर्थात आध्यात्मिक चेतना में लीन मनुष्य अपने मन में नश्वर भौतिक ऐश्वर्यों, क्रोध, लालच और शत्रुता आदि को प्रवेश करने की अनुमति नहीं देता, इसलिए उसका मन लोकातीत चिंतन में स्थिर और दिव्य चेतना में स्थित हो जाता है। यदि कोई मनुष्य अपने मन को दुःखों की चिंता करने की अनुमति देता है, तब भगवान का चिंतन समाप्त हो जाता है और मन ज्ञानातीत अवस्था से पतन की ओर चला जाता है।
वर्तमान पीड़ा से अधिक अतीत की पीड़ा का चिंतन और भविष्य की पीड़ा की आशंका मन को अजीब-सा डर और कष्ट देती है। किन्तु जब मन इन दोनों का डर और चिंता छोड़ देता है तथा केवल वर्तमान संवेदना को सहजता से टटोलता है, तब पीड़ा आश्चर्यजनक ढंग से संकुचित हो जाती है और पहले से कम भी हो जाती है। यह सर्वविदित है कि बौद्ध भिक्षुक आक्रमणकारियों के उत्पीड़न को सहन करने के लिए यही विधि अपनाते थे।
इसी प्रकार यदि मन बाहरी सुखों की लालसा करता है और संसार के विषय-भोगों की ओर भागता है, तो वह दिव्य आध्यात्मिक चेतना से विमुख हो जाता है। इसलिए स्थिर बुद्धि वाला मनीषी वही है जो मन को सुखों के लिए ललचाने और दुःखों के लिए शोक प्रकट करने की अनुमति नहीं देता। इस प्रकार मन ज्ञानातीत अवस्था में स्थित हो जाता है।




