द लोकतंत्र/ टेक्नोलॉजी : आज के डिजिटल दौर में Spy Device, माइक्रोफोन और GPS ट्रैकर जैसे सर्विलांस डिवाइस पहले की तुलना में आसानी से उपलब्ध हो गए हैं। इसके साथ ही होटल, किराए के घर, ऑफिस या निजी जगहों पर प्राइवेसी को लेकर लोगों की चिंता भी बढ़ी है। ऐसे में कई लोग छिपे हुए इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का पता लगाने के लिए बाजार में मिलने वाले स्पाई-डिवाइस डिटेक्टर का सहारा लेते हैं।
हालांकि, इन डिटेक्टरों की क्षमता को लेकर सामने आई एक नई रिसर्च ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) के शोधकर्ताओं ने 19 अलग-अलग कमर्शियल स्पाई-डिवाइस डिटेक्टरों का परीक्षण किया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि वास्तविक परिस्थितियों में आम लोग इन गैजेट्स की मदद से छिपे हुए सर्विलांस डिवाइस को कितनी प्रभावी तरीके से खोज पाते हैं।
रिसर्च के मुताबिक, डिटेक्टर का इस्तेमाल करने के बावजूद प्रतिभागी करीब 58.8 फीसदी छिपे हुए सर्विलांस डिवाइस नहीं खोज पाए। वहीं, जब लोगों ने केवल अपनी आंखों से कमरे की तलाशी ली, तब वे करीब 66.7 फीसदी डिवाइस पहचानने में नाकाम रहे। यानी डिटेक्टर से कुछ मदद जरूर मिली, लेकिन ये डिवाइस छिपे हुए सर्विलांस गैजेट्स का भरोसेमंद समाधान साबित नहीं हुए।
Spy Device डिटेक्टर इस्तेमाल करना भी आसान नहीं, सिग्नल तो दिखा देते हैं लेकिन…
शोध में शामिल 34 लोगों को ऐसे कमरों में छिपे सर्विलांस डिवाइस तलाशने का काम दिया गया, जहां फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक सामान और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली दूसरी चीजें मौजूद थीं। इस तरह की वास्तविक परिस्थितियों में छिपे डिवाइस की पहचान करना काफी चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। कई कमर्शियल डिटेक्टर रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) या अन्य इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल का पता लगाने के आधार पर काम करते हैं। समस्या यह है कि इनके जरिए मिलने वाली जानकारी सामान्य यूजर के लिए हमेशा आसान नहीं होती। डिवाइस की स्क्रीन पर सिग्नल स्ट्रेंथ, रेडियो फ्रीक्वेंसी और अन्य तकनीकी जानकारी दिखाई दे सकती है, लेकिन कई बार यह स्पष्ट नहीं होता कि यूजर को उस जानकारी के आधार पर आगे क्या करना चाहिए।
इसका मतलब यह है कि केवल डिटेक्टर खरीद लेना ही पर्याप्त नहीं है। किसी कमरे में मौजूद सामान्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी ऐसे सिग्नल पैदा कर सकते हैं, जिससे यूजर को गलत संकेत मिल सकते हैं या वास्तविक डिवाइस को पहचानना मुश्किल हो सकता है।
हिडन कैमरे रोजमर्रा की चीजों में भी छिपाए जा सकते हैं
छोटे सर्विलांस डिवाइस को आज कई सामान्य दिखने वाली वस्तुओं में छिपाया जा सकता है। इनमें घड़ी, USB चार्जर, स्मोक अलार्म, फोटो फ्रेम और खिलौने जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं। यही वजह है कि किसी अनजान जगह पर प्राइवेसी को लेकर सतर्क रहने वाले लोगों के लिए केवल एक इलेक्ट्रॉनिक डिटेक्टर पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। रिसर्च में यह भी चिंता जताई गई है कि इस तरह के सीक्रेट सर्विलांस डिवाइस का गलत इस्तेमाल घरेलू हिंसा जैसे मामलों में किसी व्यक्ति की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है।
Bluetooth ट्रैकर से अलग है चुनौती
रिसर्च में ब्लूटूथ ट्रैकर्स का भी उल्लेख किया गया है। ऐसे डिवाइस अब आम हो चुके हैं और इन्हें सामान, चाबी या अन्य वस्तुओं को खोजने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इनकी खासियत यह है कि इन्हें इस्तेमाल करना अपेक्षाकृत आसान होता है और यूजर को कई मामलों में यह जानकारी भी मिल सकती है कि आगे क्या कदम उठाना है।
इससे एक अहम अंतर सामने आता है जहां सामान्य स्पाई-डिवाइस डिटेक्टर तकनीकी सिग्नल दिखाकर यूजर को भ्रमित कर सकते हैं, वहीं कुछ आधुनिक ट्रैकिंग डिवाइस अपने इस्तेमाल और संभावित ट्रैकिंग गतिविधि को समझने के लिए ज्यादा स्पष्ट जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं। कुल मिलाकर, UCL की रिसर्च का संकेत है कि स्पाई-डिवाइस डिटेक्टर को प्राइवेसी की गारंटी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। किसी जगह पर छिपे डिवाइस की तलाश करते समय तकनीकी उपकरण के साथ-साथ सामान्य निरीक्षण और सावधानी भी महत्वपूर्ण हो सकती है।




